कुछ यूं हुए , मोहब्बत के सिलसिले
जैसे नमक पानी में घुले
याद कीजिये वो दिन
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याद कीजिये वो दिन
जज़्बात उभरा करते थे
कल-कल करते निर्झर सी
रवानी लिए
कलम -कागज़ उठाया
उढेल दिए जज़्बात
सरलता से लिख डाली
मन की हर बात
मुँह -जबानी भी
शब्दों को मिलती थी रवानी
पीढ़ी दर पीढ़ी
सुनाए जाते थे
वीर गाथाएँ और कहानी
इंसान के दिलऔर दिमाग के बीच
नहीं था कोई कंप्यूटर
थिरकती उँगलियों से
थिरकते जज़्बात
लिख दिए जाते थे
बरबस कोरे कागज़ पर
कंप्यूटर के चलन ने
बदल दिया लिखने का सलीका
किताब और पाठक का रिश्ता
उँगलियों में लग रहे जंग
और सूखने लगी स्याही
लेखनी कागज़ के संग
रह गयी अनब्याही /
समंदर कब किसी की प्यास बुझाता है
यह हुनर तो दरिया को ही आता ही
ताड़ का पेड़ कब छाया देता है किसी को
छाया तो घना पीपल ही पहुंचाता है
तेज़ रफ़्तार हवाएं बस जड़ से उखाड़ देती हैं
सुकून तो मंद बयार का झोंका ही लाता है
ऊंची मीनारें सुकून देती हैं नज़रों को
बसेरे के काम तो आशियाना ही आता है/
रजनी छाबड़ा
बहु भाषीय कवयित्री व् गीतकार
26/8 /2026
लहरिया ओढ़ा तेरे नाम का
लहरिया ओढ़ा तेरे नाम का
खुशियों के सब रंग ओढ़ लिए
लाल रंग प्यार का विस्तार
केसरिया शुचिता का आधार
पीला रंग सुनहली धूप का आभास
नीला रंग तेरे प्रेम सरीखे गगन का विस्तार
हरित रंग जीवन में हरीतिमा
सावन के झूलों के संग हिलोरे लेती मैं
तेरे प्यार की पींग में झूलती
तन मन की सुध भूलती
कान्हा, मेरे कान्हा, मेरे कान्हा
दिन रात बस तेरी आराधना
सारी दुनिया बिसरा दी
सुन तेरी बांसुरी की तान
रजनी छाबड़ा
बहु भाषीय कवयित्री व् गीतकार
14 /8 /2026