Monday, May 4, 2026

अतीत के गलियारे

 आज अतीत के गलियारे में झांकता हूँ, तो ज़िन्दगी कितनी बेमानी नज़र आती है/ बचपन के यादें धुंधला चुकी है/ अल्हड़ यौवन की यादें भी दुःख ही दे रही हैं/ शादी के बाद भी  पूर्णता का एह्सास न पा सका/ प्रेम-विरह, बस इनकी यादों के वितान तले ही तो जी रहा हूँ मैं/

दुनियावी नज़र से देखा जाये तो मैं  एक कामयाब, दौलतमंद इंसान हूँ/ ऐशो आराम की ज़िंदगी बसर करता हूँ/ दौलत के दम पर जो चाहे हासिल कर सकता हूँ/ पर क्या खुश हूँ मैं? सपनों के पंखों पर सवार हो कर, नील गगन में उन्मुक्त उड़ान भरना, हवाओं के साथ अठखेलियां करना और बहारों का लुत्फ़ लेना,अब तो यादों की और ख्वाबों की बात हो गया है/

बचपन का खुशनुमा सफर पार करने  बाद, जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही, जीने का अंदाज़ बदलने लगता है/ महसूस होता है, जहान की सारी सौगातें हमारे लिए ही तो है ; हाथ फैलाएं और अपनी झोली में समेट लें/ बहारों से बटोर लें ,रंग सारे और आँचल में समेत लें चाँद तारे/

TO BE CONTINUED

 

कॉल बेल थोड़ा बेवक़्त ही बजी थी/  उस अनामिका थोड़ी अलसाई सी आराम के मूड में थी/ रोजमर्रा  के काम  अभी निपटे  ही थे/ थोड़ा आराम करने के बाद, कुछ लिखने  पढ़ने की आदत सी थी /फ़िर भी सलीके का तक़ाज़ा यही थी कि दरवाज़ा खोल दिया जाये/

सो, अनमने अंदाज़ से ही सही, पर दरवाज़ा खोल के, एक हल्की सी मुस्कान ओढ़ के, उसे  अंदर आने के लिए कहा/

शहज़ादों जैसी कद-काठी, लम्बा ऊंचा क़द, सलीकेदार पहरान, हलके घुंघराले बाल, कुछ कुछ ज़िंदगी जैसे उलझे हुए और माथे पर एक आवारा लट/ उम्र होगी अंदाज़न 29 साल/ 

अपनी ज़िंदगी के किसी अहम मसले पर सलाह लेने आया था/ और इस उम्र में मसला तो अक्सर एक ही होता है/ इश्क़ का जाल, जिस में जाने अनजाने उलझ कर रह जाते हैं/ ख़ुद से बेख़बर, नहीं जानते कि अंजाम क्या होगा/ 

सहज को कुछ अंदाज़ था के इस अधेड़ महिला को अपनी दास्तान सुनाने के बाद, शायद कोई हल निकल पायेगा/  उसे यह भी मालूम था कि  यह महिला उस  लड़की से  बरसों से अच्छे से परिचित थी , क्योंकि वह उसकी सहेली की बेटी थी/

सहज ने कुछ झिझकते हुए , शुरुआत से आपबीती बतानी शुरू की/ बिना कुछ छुपाये, बिना लाग  लपेट के/ 


TO BE CONTINUED 

  बात सिर्फ इतनी सी 

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बगिया की
शुष्क घास पर
तनहा बैठी वह
और सामने
आँखों में तैरते
फूलों से नाज़ुक
किल्कारते बच्चे

बगिया का वीरान कोना
अजनबी का
वहाँ से गुजरना
आंखों का चार होना

संस्कारों की जकड़न 
पहराबंद
उनमुक्त धड़कन
अचकचाए
शब्द
झुकी पलकें
जुबान खामोश
रह गया कुछ
अनसुना,अनकहा

लम्हा वो बीत गया
जीवन यूँ ही रीत गया

जान के भी
अनजान बन
कुछ
बिछुडे ऐसा
न मिल पाये
कभी फिर
जंगल की
दो शाखों सा

आहत मन की बात
सिर्फ इतनी
तुमने पहले क्यों
न कहा

वह  आदिकाल
से अकेली
वो अनंत काल
से उदास
और सामने
फूलों से नाज़ुक बच्चे
खेलते रहे/

Friday, May 1, 2026

युगों युगों तक


युगों युगों तक 

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 ज़िंदगी की किसी अनजानी राहगुज़र पर 

मिल जाये जब यकायक मनचाहा हमसफर 

कहता हैं मन, कभी थमे न यह सफर 

एक एक पल , बन जाये एक युग का 

और सफर चलता रहा युग-युगान्तर /


(पुरानी डायरी के पन्नों से)

रजनी छाबड़ा  

प्यार इक तरफ़ा नहीं है


 सुर सजते हैं जब 

मन के तार बजते हैं 


लहरें अठखेलियाँ करती 

सागर के साथ  

सागर को भी देती विस्तार 

प्यार इक तरफ़ा नहीं है 


पावस की बूँद की आस 

चातक सहेजे रखता प्यास 

चाहे कितनी भी हो दुश्वारियां 

ऐसी ही सच्चे आशिकों की यारियां/


रजनी छाबड़ा 

बहुभाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 


Thursday, April 30, 2026

दुनिया का दस्तूर यही है

 दुनिया का दस्तूर यही है 

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या, ख़ुदा !

दीन दुनिया के  

रस्मों रिवाज़ 

क्यों प्यार करने वालो से 

रहते नाराज़ 


खुशनसीब हैं परिंदे 

जिन्हें नहीं कोई बंदिशे 

जब चाहा पंख पसारे 

भर ली उन्मुक्त उड़ान 

कोई उनसे नहीं पूछता सवाल 

किसे के साथ विचर रहे थे तुम दिन भर 

किस पेड़ पर बिताई तुमने सारी रात 


इंसानो  की तो ज़िन्दगी ही रीत जाती है 

दुनियावी दस्तूरों की बेड़ियाँ के बंधन में 

दस्तूर हावी हो जाते हैं उन्मुक्त जीवन पर 


रजनी छाबड़ा 



ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी

  ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी 

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ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी 

तुम तन्हा और मैं तन्हा 


जंगल की  दो शाखों सा 

जो कभी मिल के भी नहीं मिलते 


अधूरी हैं तमन्ना, अधूरी मिलन की आरज़ू 

फ़ूल अब खिल कर भी नहीं खिलते 


तुम्हारे बिना दिल यूं रहे बेक़रार 

दिन उगते ही, शाम ढलने का रहे इंतज़ार 


मन की खुली सीप में गिरी जो बूँद 

प्यार के सच्चे  मोती सी संजोयी 


क्या अब शूल बन रह जाएगी 

ता-उम्र हमें तड़पाएगी 


दुनिया क्यों ही सितम करती रहेगी 

और आशिकों पर क़यामत आएगी 


रजनी छाबड़ा