*प्राक्कथन*
‘तिनका-तिनका नेह’ - यह मेरा पाँचवाँ हिंदी काव्य-संग्रह आप सभी सुधि पाठकों के सादर सुपुर्द करते हुए, मन में एक अनकहा-सा उल्लास और आत्मीय संतोष अनुभव कर रही हूँ।
इस संग्रह की आरंभिक कविताएँ प्रकृति-सौंदर्य की उन अनुभूतियों से प्रेरित हैं, जो मेरे श्रीनगर प्रवास के दौरान हृदय में धीरे-धीरे उतरती रहीं। फिर समय के प्रवाह में, राजस्थान की सुनहरी धरा पर जब काव्य-सृजन का नव-प्रवाह आरंभ हुआ, तो वह एक विरामहीन यात्रा बन गया - ईश्वर की कृपा और पाठकों की आत्मीय प्रतिक्रिया से संबलित।
मैं हिंदी, अंग्रेज़ी, पंजाबी, राजस्थानी और अपनी मातृभाषा सिराइकी में स्वतंत्र रूप से लेखन करती हूँ, साथ ही हिंदी, पंजाबी, राजस्थानी, उर्दू और नेपाली से अंग्रेज़ी में अनुवाद और अनुसृजन का कार्य भी निरंतर कर रही हूँ। हाल ही में एक महाकाव्य का अनुवाद अंग्रेज़ी से हिंदी में पूर्ण किया है, जो मेरे रचनात्मक पथ की एक और उपलब्धि है।
जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँ, रिश्तों की गरिमा, अपनों का सान्निध्य, स्मृतियों के मधुबन, अस्तित्व की तलाश और सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व - यही तो हमारे सामाजिक परिवेश के वे ताने-बाने हैं, जिनसे भावनाओं का वस्त्र बुना जाता है। जब यही ताना-बाना खंडित होने लगे, तो कवि का संवेदनशील मन मौन कैसे रह सकता है?
मैं लिखती नहीं...
काग़ज़ पर मेरे जज़्बात बहते हैं।
कह न पाई जो कभी,
सिले, ख़ामोश लबों से,
वही अनकही कहानी कहते हैं।
बचपन से लेकर जीवन के इस पड़ाव तक, जिन अनुभवों ने मुझे छुआ - सामाजिक चिंता, नगरीकरण का दबाव, अन्याय, असंतुलन, अपनी माटी की महक, जीवन-मूल्यों और संस्कारों के प्रति आस्था, प्रेम, प्रतीक्षा, विरह - इन सभी अनुभूतियों ने शब्दों का रूप लेकर इन कविताओं में आकार पाया है।
प्रकृति की हरित छांव, सिंदूरी सूरज, तारों जड़ी रातें, नभ और सागर का विस्तार - इन ऐंद्रिय बिम्बों ने मेरी चेतना को छुआ है। उन क्षणों को काव्यात्मक भाषा में ढालना मेरा प्रयास रहा है।
आज की इस आपाधापी भरी दुनिया में, हम अपने भीतर झाँकने का समय ही नहीं निकाल पाते। मकड़ी के जाले जैसे ताने-बाने में उलझते हुए, हम अपने ही बनाए जाल में खोते जा रहे हैं। ऐसे में, आत्म-संवाद और निजता की पहचान, एक आंतरिक शांति की खोज बन जाती है।
बेवजह सी लगती ज़िंदगी में
कोई वजह तलाशिए।
ख़ुद से लगाव
अक्सर कर देता है दूर तनाव।
हम ईश्वर की अनुपम रचना हैं-
स्वाभिमान और निजता का यह अहसास
जीवन में सार्थकता और निखार लाता है।
‘तिनका-तिनका नेह’ - यही भावना मेरे इस संग्रह का केंद्र है। नेह के उन तिनकों को समेटने का प्रयास है, जो जीवन की बिखरी स्मृतियों, संबंधों, संघर्षों और सुख-दुख की परतों से जुड़ते हैं। मैं इस संग्रह का मूल्यांकन अपने प्रिय पाठकों पर छोड़ती हूँ - आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए पथ-प्रदर्शक होंगी।
रजनी छाबड़ा
बहुभाषीय कवयित्री व अनुवादिका
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