शिव भजन
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अमृत जग में बाँट के, विष का प्याला पीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
भक्तों की खुशियों में , खुश हो के जीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
जटाओं में पावन गंगा विराजे
कंठ में सर्प का हार साजे
शिव भजन
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अमृत जग में बाँट के, विष का प्याला पीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
भक्तों की खुशियों में , खुश हो के जीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
जटाओं में पावन गंगा विराजे
कंठ में सर्प का हार साजे
शिव भजन
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अमृत जग में बाँट के, विष का प्याला पीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
भक्तों की खुशियों में , खुश हो के जीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
जटाओं में पावन गंगा विराजे
कंठ में सर्प का हार साजे
भभूत का श्रृंगार किये तुम
मृग छाल के आसन पर विराजे
अपनी धुन में मगन तुम
डम -डम डमरू बाजे
तुम बसते रोम रोम, सृष्टि के घट घट
हर लेना मेरी विपत्ति विकट
याद कीजिये वो दिन
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याद कीजिये वो दिन
जज़्बात उभरा करते थे
कल-कल करते निर्झर सी
रवानी लिए
कलम -कागज़ उठाया
उढेल दिए जज़्बात
सरलता से लिख डाली
मन की हर बात
मुँह -जबानी भी
शब्दों को मिलती थी रवानी
पीढ़ी दर पीढ़ी
सुनाए जाते थे
वीर गाथाएँ और कहानी
इंसान के दिलऔर दिमाग के बीच
नहीं था कोई कंप्यूटर
थिरकती उँगलियों से
थिरकते जज़्बात
लिख दिए जाते थे
बरबस कोरे कागज़ पर
कंप्यूटर के चलन ने
बदल दिया लिखने का सलीका
किताब और पाठक का रिश्ता
उँगलियों में लग रहे जंग
और सूखने लगी स्याही
लेखनी कागज़ के संग
रह गयी अनब्याही /