युगों युगों तक
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ज़िंदगी की किसी अनजानी राहगुज़र पर
मिल जाये जब यकायक मनचाहा हमसफर
कहता हैं मन, कभी थमे न यह सफर
एक एक पल , बन जाये एक युग का
और सफर चलता रहा युग-युगान्तर /
(पुरानी डायरी के पन्नों से)
रजनी छाबड़ा
युगों युगों तक
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ज़िंदगी की किसी अनजानी राहगुज़र पर
मिल जाये जब यकायक मनचाहा हमसफर
कहता हैं मन, कभी थमे न यह सफर
एक एक पल , बन जाये एक युग का
और सफर चलता रहा युग-युगान्तर /
(पुरानी डायरी के पन्नों से)
रजनी छाबड़ा
सुर सजते हैं जब
मन के तार बजते हैं
लहरें अठखेलियाँ करती
सागर के साथ
सागर को भी देती विस्तार
प्यार इक तरफ़ा नहीं है
पावस की बूँद की आस
चातक सहेजे रखता प्यास
चाहे कितनी भी हो दुश्वारियां
ऐसी ही सच्चे आशिकों की यारियां/
रजनी छाबड़ा
बहुभाषीय कवयित्री व् अनुवादिका
दुनिया का दस्तूर यही है
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या, ख़ुदा !
दीन दुनिया के
रस्मों रिवाज़
क्यों प्यार करने वालो से
रहते नाराज़
खुशनसीब हैं परिंदे
जिन्हें नहीं कोई बंदिशे
जब चाहा पंख पसारे
भर ली उन्मुक्त उड़ान
कोई उनसे नहीं पूछता सवाल
किसे के साथ विचर रहे थे तुम दिन भर
किस पेड़ पर बिताई तुमने सारी रात
इंसानो की तो ज़िन्दगी ही रीत जाती है
दुनियावी दस्तूरों की बेड़ियाँ के बंधन में
दस्तूर हावी हो जाते हैं उन्मुक्त जीवन पर
रजनी छाबड़ा
ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी
ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी
तुम तन्हा और मैं तन्हा
जंगल की दो शाखों सा
जो कभी मिल के भी नहीं मिलते
अधूरी हैं तमन्ना, अधूरी मिलन की आरज़ू
फ़ूल अब खिल कर भी नहीं खिलते
तुम्हारे बिना दिल यूं रहे बेक़रार
दिन उगते ही, शाम ढलने का रहे इंतज़ार
मन की खुली सीप में गिरी जो बूँद
प्यार के सच्चे मोती सी संजोयी
क्या अब शूल बन रह जाएगी
ता-उम्र हमें तड़पाएगी
दुनिया क्यों ही सितम करती रहेगी
और आशिकों पर क़यामत आएगी
रजनी छाबड़ा
गर तुम साथ होते
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यह हसरत ही रही कि ज़िन्दगी के राहों पे साथ तेरा होता
पार कर जाते हँसते हुए सहरा दर सहरा , गर हाथों में हाथ तेरा होता
मुझे मिली हैं नसीब में जो स्याह दर स्याह रातें , गर तुम साथ होते
स्याह रातों के बाद उजला सवेरा होता/
ज़िंदगी हैं मेरी , तेरी छोड़ी हुई अधूरी क़िताब
गर तुम साथ होते, मुक़्क़मल यह अफसाना मेरा होता/
रजनी छाबड़ा
टूट कर जुड़ भी जाएँ, तो दरार दिखती है
मन के बाजार में फिर नहीं वो शै बिकती है
यूँ तो चाँद की चाँदनी बिखरती है सारे जहां पर
ग्रहण लगे चाँद से चांदनी नहीं रिसती है
दुनिया के लिए वही सुबह, वही है शब
बाद तेरे मेरी हर सुबह शब् जैसी, हर शबे गम सिसकती है
धुँधला रहे तेरे नक़्श ए पाँ, वक़्त की रेत में
अब रास्ता ही रास्ता है , मंज़िल नहीं दिखती है/
रजनी छाबड़ा