Expression
Sunday, April 26, 2026
BIKANA RATAN AWARD
Saturday, April 25, 2026
गर तुम साथ होते
गर तुम साथ होते
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यह हसरत ही रही कि ज़िन्दगी के राहों पे साथ तेरा होता
पार कर जाते हँसते हुए सहरा दर सहरा , गर हाथों में हाथ तेरा होता
मुझे मिली हैं नसीब में जो स्याह दर स्याह रातें , गर तुम साथ होते
स्याह रातों के बाद उजला सवेरा होता/
ज़िंदगी हैं मेरी , तेरी छोड़ी हुई अधूरी क़िताब
गर तुम साथ होते, मुक़्क़मल यह अफसाना मेरा होता/
रजनी छाबड़ा
मन के बाजार में
टूट कर जुड़ भी जाएँ, तो दरार दिखती है
मन के बाजार में फिर नहीं वो शै बिकती है
यूँ तो चाँद की चाँदनी बिखरती है सारे जहां पर
ग्रहण लगे चाँद से चांदनी नहीं रिसती है
दुनिया के लिए वही सुबह, वही है शब
बाद तेरे मेरी हर सुबह शब् जैसी, हर शबे गम सिसकती है
धुँधला रहे तेरे नक़्श ए पाँ, वक़्त की रेत में
अब रास्ता ही रास्ता है , मंज़िल नहीं दिखती है/
रजनी छाबड़ा
Friday, April 24, 2026
नम हवाएं
नम हवाएं
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हवाओं में नमी है
मेरी नम आँखों जैसी
क्या उन पर भी
किसी की जुदाई का
असर छाया है ?
haiku 2
Hawaon mein name hai, meri nm.aankhon. jaisee
Kya un pr kisee zudai ka asar chhaya hai
महकी फ़िज़ाएं
महकी फ़िज़ाएं
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जुबां शीरीं हो गयी है
आँखों में ख़ुमार उतर आया है
चंद शबनमी क़तरे मिले ताज़ा कली से
अठखेलियों का मौसम आया है
महकी लगती हैं फ़िज़ाएं
बहार पर निख़ार उतर आया है
तुम भी महसूस कर रहे हो शिद्दत से
या फिर मुझ ही पे खुमार उतर आया है/
रजनी छाबड़ा
Haiku 1
Jubban sheeren ho gayi hai, aankhon mein khumaar uttar aaya hai
Chnd shabnamee qatre gale milee taza kali se, athkheliyon ka mousam aaya hai
Mahkee lagtee hai fizayen, Bahar pe nikhar uttar aaya hai
Tum bhee mahsus kr rho shiddat se
Ya phir mujh pr hee khumaar uttar aaya hai
Rajni Chhabra
Tuesday, April 14, 2026
रोगी कैसे रहता है निरोगी ?
रोगी कैसे रह सकता है निरोगी
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कुछ वर्ष पुरानी घटना आप सब के साथ सांझा कर रही हूँ; एक ऐसी सत्य घटना जो आप में एक सकरात्मक सोच का संचार करेगी/
मैं अस्पताल में भर्ती थी , कुछ गंभीर स्वास्थ्य सम्बंधित समस्या के कारण/ कुछ न कुछ मेडिकल परीक्षण होते रहते थे/ परिणाम आने तक मन आशंकित ही रहता था/ मन में कई तरह के सवाल उठते रहते थे/ कब पूरी तरह से स्वस्थ हो पाऊंगी/ कब सामान्य जीवन फिर से जी पाऊँगी ?
मेरे साथ वाले बेड पर जो रोगी था, उसका बहुत भयानक एक्सीडेंट हुआ था, जिस कारण उसे लम्बे आरसे के लिए अस्पताल में रहना ज़रूरी था/ उसके बहुत से फ्रैक्चर हुए थे, कुछ दाँत भी टूट गए थे; चेहरे पर भी चोट के निशान अभी भी गहरे थे ; शरीर के कुछ अन्य अंगों पर भी चोटें आयी थी/ खुद हिलना , डुलना भी उसके बस की बात नहीं थी/ करवट भी नहीं ले पाता था/ रुचिकर भोजन तो अब जैसे उसके नसीब में ही नहीं था, एक लम्बे अरसे के लिए/ इस सब के बावज़ूद , कभी उसके चेहरे पर शिकन हैं आती थी/
डॉ. साहब राउंड पर आए, रिपोर्ट्स तो देख ही चुके थे/ सामान्यत उसका हाल चाल पूछने लगे/ उसके शांत रवैये से डॉ. साहब भी काफी प्रभावित थे/
उस से पूछा, "आपको कोई और परेशानी तो नहीं/ और कोई समस्या हो, आप मुझे बेझिझक बता सकते हैं/"
रोगी से कहा," और तो कुछ समस्या नहीं/ धीरे धीरे हालत बेहतर हो ही जाएगी/ फ़िलहाल सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब में ठहाके लगाना चाहता हूँ, दिल खोल के हँसना चाहता हूँ, तब मेरे टाँके दुखते हैं/"
रजनी छाबड़ा
बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका
नोट: मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/
रजनी छाबड़ा
Monday, April 6, 2026
यूं भी क्या जीना/?
यूं भी क्या जीना?
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ब्रह्मा का एक परम भक्त रात दिन उस की आराधना में लगा रहता / उसकी आराधना से प्रसन्न हो ब्रह्मा न कहा, " वत्स ! मैं तुम्हारी निष्ठा व् भक्ति भाव से अत्यंत प्रसन्न हूँ/ तुम मुझ से अपना मनपसंद वर मांग सकते हो; मैं सहर्ष दूंगा/"
भक्त ने कहा, " हे, प्रभु! आप मुझे वर दीजिये कि कभी भी मेरी मृत्यु न हो/" ब्रह्मा असमंजस में पड़ गए , क्योंकि यह वर तो विधि के विधान के विरुद्ध था/ और अगर देने से इंकार करते हैं, तब भी उनकी प्रतिष्ठा पर आँच आएगी/ इस दुविधा से उबरने का उन्होंने एक उपाय ढूँढा/ उन्होंने भक्त से कहा, "मैं विधि के विधान के विरुद्ध तो नहीं जा सकता , क्योंकि जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है/ परन्तु मैं तुम्हे यह वर देता हूँ कि तुम तब तक जीवित रहोगे, जब तक तुम ख़ुद नहीं कह दो कि तुम मरना चाहते हो/"
भक्त से इस वरदान को स्वीकार किया और आराम से, शांतिपूर्वक जीवन का आनंद लेने लगा/ परिवार में उसकी एक विशिष्ट पहचान थी/ बेटे, बहुएँ , बेटियां, दामाद और उनकी संतान, सभी उसे समुचित सम्मान देते/ वक़्त का पहिया घूमता रहा/ धीरे-धीरे शारीरिक दुर्बलता महसूस होने लगी व् मानसिक क्षमता भी अब पहले जैसे नहीं रही/ वह घर के एक छोटे से कमरे में दिन रात अकेले पड़ा रहता/ दिन में एक आध बार आकर कोई उसे भोजन परोस देता/ परन्तु कोई भी उसके साथ बातचीत के लिए वक़्त नहीं निकालता था/ उसके बाद अगली पीढ़ी आयी , जो उसे पहचानती तक नहीं थी; उसके बारे में कुछ जानती तक नहीं थी/ क्षीण काया वाला यह व्यक्ति बस अपनी ही दुनिया में सिमट कर रह गया था/ कभी आहें भरता, कभी दर्द से परेशान हो कर चीखता , कभी खांसता रहता/ कुछ खाने-पीने की भी इच्छा नहीं होती था/ एक दिन, उसकी पाँचवी पीढ़ी के एक बालक ने अपने पिताश्री से पूछा , " उस कोने से जिस व्यक्ति के हर वक़्त कराहने या खांसने की आवाज़ आती है, वह कौन है?" पिताश्री ने उत्तर दिया, " मैं तो ख़ुद इस बारे में कुछ नहीं जानता / जब मैंने अपने पिता जी इस बुजुर्ग के बारे में पूछा ;उन्होंने भी अनभिज्ञता व्यक्त की / उनका कहना यह था कि मेरे पिताश्री भी इस बारे में कुछ नहीं बता पाए/ बस यही बताया कि घर का कोई न कोई प्राणी उनके कमरे में भोजन पहुंचा कर, बिना कोई बातचीत किये, वापिस आ जाता है/ पीढ़ियां बीत चुकीं,सब उसकी खांसने, कराहने की आवाज़ें ही सुनते आये है/ इसके अलावा, इस व्यक्ति के बारे मैं कुछ नहीं जानता/ "
भक्त के कानों में जब यह बात पहुँची , उसे बहुत ख़ेद हुआ कि उसकी कोई पहचान नहीं; कोई उसका नाम तक नहीं जानता/ उसका कोई अस्तित्व नहीं; उसके होने या न होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता /वह किसी के काम नहीं आ सकता और ख़ुद को भी ख़ुद नहीं संभाल सकता ; तो ऐसे जीने का क्या फायदा/ उसने ब्रह्मा को याद किया और उनसे विनती की, " हे ,प्रभु! मुझे वापिस अपने पास बुला ले/ जब मेरी कोई पहचान ही नहीं है यहां, ऐसी दुनिया में जी कर, क्या करूंगा?"
और ब्रह्मा ने उसकी पुकार सुन ली/ उसकी विनती स्वीकार करते हुए,उसे साँसों के बंधन से मुक्ति दे दी/
'ज़िन्दगी की किताब से' मेरे कहानी संग्रह से उद्धृत एक कहानी
रजनी छाबड़ा
बहु-भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका

