भीड़ भरी सड़क और वृद्धा
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भीड़ भरी सड़क और वृद्धा
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आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 2
किसान, आक्रोश से भरा, भुनभुनाता हुआ, ईश्वर से शिकायत करने लगा, "मैंने आप पर इतना विश्वास किया और आपने मुझे यह फल दिया?"
ईश्वर ने कहा," शांत मन से मेरे प्रश्नों का उतर दो/ क्या तुमने खेतों में बुवाई करने के बाद, एक बार भी पौधों की देखभाल की; उनकी सार-सम्भाल की: क्या उन्हें समयानुसार पानी दिया या कभी खाद दी? कभी खर-पतवार हटाए?''
किसान ने उत्तर दिया ,"मैंने ऐसा तो कुछ भी नहीं किया/ बस भाग्य भरोसे बैठा रहा कि आपने वरदान दिया है तो सब ठीक ही हो जायेगा/"
ईश्वर ने उसे उसकी गलती से अवगत करवाया/ "वही पौधे तन कर खड़े हो सकते हैं, जो गर्म -सर्द हवाओं को सीना तान के झेलें/ बारिश से भी विचलित न हो और झुलसाती धूप को भी सहजता से स्वीकारें/ तभी सही समय आने पर वे परिपक़्व हो पाते है और गेंहू की बालियाँ दानो से भर जाती हैं/ साथ ही साथ किसान को भी तो परिश्रम करना पड़ता है/ मैंने तुम्हारी फसल को प्राकृतिक आपदाओं से बचाया , परन्तु श्रम करना तो तुम्हारा कर्तव्य था/ केवल भाग्य भरोसे रहने से कैसे पार पड़ेगी ?
किसान को अपनी ग़लती समझ आ गयी और उसके बाद जीवन भर उसने कभी मेहनत से मुहँ नहीं मोड़ा और न ही कभी ईश्वर के प्रति आस्था से विमुख हुआ / हर वर्ष नयी फसल उगाने से पहले, ईश्वर से प्रार्थना अवश्य करता था कि उसे उसकी मेहनत का फल दे और प्राकृतिक आपदाओं के कोप से बचाये रखे/
नोट: मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/
रजनी छाबड़ा
आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 1
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जन जीवन से जुड़ी एक छोटी सी घटना आपके साथ सांझा कर रही हूँ, इस उम्मीद के साथ कि यह आपकी सोच को एक सार्थक दिशा देगी/
एक गांव में एक मेहनती किसान पूरे मनोयोग से अपना सारा दिन अपने खेतों में खेती-बाड़ी करते हुए बिता देता/ कड़कती धूप, झुलसाती गर्मी , बारिश, ठिठुराती सर्दी, इस सभी मौसमों को समभाव से झेलता, अपने काम में लगा रहता/ जब फसल पकती, रात रात भर खेत में चारपाई डाल के सोता, फसल की निगरानी के लिए/ अलाव भी जला लेता, ताकि जानवर भी खेत को कोई नुक्सान न पहुंचा सके और वह ख़ुद भी सुरक्षित रहे/
जैसे ही फसल की कटाई का काम समाप्त होगा और वह दो पल के लिए राहत की सांस लेता, ज़मींदार आ धमकता, अपने क़र्ज़ की वसूली के लिए / खेत बरसों से ज़मींदार के पास गिरवी थे/ आधी से अधिक फसल वो वसूल के लेता और बेचारा किसान मन मसोस के रह जाता/
एक दिन, बहुत दुखी मन से, वह ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाया/ विनती की कि उसे अगले वर्ष ख़ूब लहलहाती फसल दे/ मेहनत करते करते वह उक्त चुका था / शारीरिक श्रम की शक्ति भी अब पहले जैसी नहीं थी/ ईश्वर ने उसको लहलहाती फ़सल का वरदान दे दिया/
किसान आश्वस्त हो गया और उसने सोचा कि अब कुछ आराम से जीवन बिता लूं / पहले जैसे मेहनत की क्या ज़रूरत है/ ईश्वर ने वादा किया है तो निभाएगा ही/
उचित समय आने पर फसल तैय्यार हो चुकी थी/ लहलहाती फसल देख का किसान मन ही मन बहुत खुश था कि अब तो ज़मींदार का क़र्ज़ भी उतार लेगा और उसके बाद अपनी गृहस्थी के लिए भी कुछ अनाज बच जायेगा; आराम से गुज़र -बसर हो जाएगी/
परन्तु, जैसे ही उसने फसल काटनी शुरू की, उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा/ वह सदमे में आ गया/ गेहूं की लहलहाती बालियों में तो कुछ और ही राज़ छुपा था/ जैसे ही छटनी शुरू की, किसान यह देख कर सकते में आ गया कि गेहूँ की बालियाँ अंदर से खोखली थी/ उनमें गेहूँ का एक भी दाना न था/
कृपया शेष कहानी के लिए देखिये आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये :भाग 2
नोट: मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/
रजनी छाबड़ा
न मत कहिये
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जिन्दगी को कभी भी
न मत कहिये
चाहे आप ज़िन्दगी से
खुश हों या नाख़ुश
ज़िंदगी हमेशा आपको
बेहतर ढंग से
जीने का अवसर देती है
गिला- शिक़वा करने की बजाय
संतुष्ट रहने का प्रयास कीजिये
ज़िंदगी आपको अवसर देगी
कैक्टस में फ़ूल सरीखा
खिलने का
अगर आप विश्वास
क़ायम रखेंगे ख़ुद में
और सृष्टिकर्ता में/
@रजनी छाबड़ा
बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका
20 /2/2026
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युगों से
पिंजरे में क़ैद
पंछियों ने
मुक्ति की योजना बनाई
बहलिए से विनती की
पिंजरे से मुक्त करने की
नभ का विशाल विस्तार
उन्हें मानो उकसा रहा था
बेड़ियाँ तोड़ने के लिए
मन ही मन भयभीत थी
विस्तृत आकाश में
उन्मुक्त उड़ान लेने से पहले
जहाँ चीलें और गिद्ध भी
अपने बड़े बड़े पंख पसारे
नुकीली चोंच, तीखे पंजों
और शिकार के लिए
पैनी दृष्टि के साथ
उन्मुक्त उड़ते रहते हैं
कहीं उन पर
जानलेवा हमला न कर दें
बहलिए ने उन्हें
चेताने की कोशिश की
पर ज़िद पर उतारू
चिड़ियों के समक्ष
झुकना ही पड़ा उसे
अलग थलग उड़ने की बजाय
वे उड़ी झुंड में
उनका यह चातुर्य देख कर
अब चीलें भी
सकते में आ गयी
दृढ इच्छा शक्ति से भरी
एक सुगठित सेना
जो परवाह नहीं करती
विषम परिस्थितियों की
डटी रहती है चट्टान सरीखी
उस सेना पर आक्रमण करना
कभी भी आसान नहीं होता
अब बहेलियों ने भी
बदल डाली है अपनी सोच
ख़ुशियों से भरपूर
फड़फड़ाते पँखों को देख
और अपेक्षाकृत पसंद करते है
पंछी यूं ही आनंद लेते रहें
उन्मुक्त उड़ान का /
रजनी छाबड़ा
बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका