Tuesday, March 10, 2026

कैसे समेटूं मैं

 तुम तो सिमट कर रह गए 

इक तस्वीर में

कैसे समेटूं मैं 

अपने बिख़री तक़दीर को 


धड़कनें अब 

सदा नहीं देती 

तेरी तस्वीर से 

और अनजान हूँ मैं 

अपनी धड़कनों की 

तक़दीर से 

(पुरानी डायरी से )

रजनी छाबड़ा 

11 /3 /1989