Thursday, April 30, 2026

दुनिया का दस्तूर यही है

 दुनिया का दस्तूर यही है 

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या, ख़ुदा !

दीन दुनिया के  

रस्मों रिवाज़ 

क्यों प्यार करने वालो से 

रहते नाराज़ 


खुशनसीब हैं परिंदे 

जिन्हें नहीं कोई बंदिशे 

जब चाहा पंख पसारे 

भर ली उन्मुक्त उड़ान 

कोई उनसे नहीं पूछता सवाल 

किसे के साथ विचर रहे थे तुम दिन भर 

किस पेड़ पर बिताई तुमने सारी रात 


इंसानो  की तो ज़िन्दगी ही रीत जाती है 

दुनियावी दस्तूरों की बेड़ियाँ के बंधन में 

दस्तूर हावी हो जाते हैं उन्मुक्त जीवन पर 


रजनी छाबड़ा 



ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी

  ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी 

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ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी 

तुम तन्हा और मैं तन्हा 


जंगल की  दो शाखों सा 

जो कभी मिल के भी नहीं मिलते 


अधूरी हैं तमन्ना, अधूरी मिलन की आरज़ू 

फ़ूल अब खिल कर भी नहीं खिलते 


तुम्हारे बिना दिल यूं रहे बेक़रार 

दिन उगते ही, शाम ढलने का रहे इंतज़ार 


मन की खुली सीप में गिरी जो बूँद 

प्यार के सच्चे  मोती सी संजोयी 


क्या अब शूल बन रह जाएगी 

ता-उम्र हमें तड़पाएगी 


दुनिया क्यों ही सितम करती रहेगी 

और आशिकों पर क़यामत आएगी 


रजनी छाबड़ा