ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी
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ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी
तुम तन्हा और मैं तन्हा
जंगल की दो शाखों सा
जो कभी मिल के भी नहीं मिलते
अधूरी हैं तमन्ना, अधूरी मिलन की आरज़ू
फ़ूल अब खिल कर भी नहीं खिलते
तुम्हारे बिना दिल यूं रहे बेक़रार
दिन उगते ही, शाम ढलने का रहे इंतज़ार
मन की खुली सीप में गिरी जो बूँद
प्यार के सच्चे मोती सी संजोयी
क्या अब शूल बन रह जाएगी
ता-उम्र हमें तड़पाएगी
दुनिया क्यों ही सितम करती रहेगी
और आशिकों पर क़यामत आएगी
रजनी छाबड़ा