Monday, May 4, 2026

अतीत के गलियारे

 आज अतीत के गलियारे में झांकता हूँ, तो ज़िन्दगी कितनी बेमानी नज़र आती है/ बचपन के यादें धुंधला चुकी है/ अल्हड़ यौवन की यादें भी दुःख ही दे रही हैं/ शादी के बाद भी  पूर्णता का एह्सास न पा सका/ प्रेम-विरह, बस इनकी यादों के वितान तले ही तो जी रहा हूँ मैं/

दुनियावी नज़र से देखा जाये तो मैं  एक कामयाब, दौलतमंद इंसान हूँ/ ऐशो आराम की ज़िंदगी बसर करता हूँ/ दौलत के दम पर जो चाहे हासिल कर सकता हूँ/ पर क्या खुश हूँ मैं? सपनों के पंखों पर सवार हो कर, नील गगन में उन्मुक्त उड़ान भरना, हवाओं के साथ अठखेलियां करना और बहारों का लुत्फ़ लेना,अब तो यादों की और ख्वाबों की बात हो गया है/

बचपन का खुशनुमा सफर पार करने  बाद, जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही, जीने का अंदाज़ बदलने लगता है/ महसूस होता है, जहान की सारी सौगातें हमारे लिए ही तो है ; हाथ फैलाएं और अपनी झोली में समेट लें/ बहारों से बटोर लें ,रंग सारे और आँचल में समेत लें चाँद तारे/

TO BE CONTINUED

  बात सिर्फ इतनी सी 

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बगिया की
शुष्क घास पर
तनहा बैठी वह
और सामने
आँखों में तैरते
फूलों से नाज़ुक
किल्कारते बच्चे

बगिया का वीरान कोना
अजनबी का
वहाँ से गुजरना
आंखों का चार होना

संस्कारों की जकड़न 
पहराबंद
उनमुक्त धड़कन
अचकचाए
शब्द
झुकी पलकें
जुबान खामोश
रह गया कुछ
अनसुना,अनकहा

लम्हा वो बीत गया
जीवन यूँ ही रीत गया

जान के भी
अनजान बन
कुछ
बिछुडे ऐसा
न मिल पाये
कभी फिर
जंगल की
दो शाखों सा

आहत मन की बात
सिर्फ इतनी
तुमने पहले क्यों
न कहा

वह  आदिकाल
से अकेली
वो अनंत काल
से उदास
और सामने
फूलों से नाज़ुक बच्चे
खेलते रहे/