Monday, May 4, 2026

 

कॉल बेल थोड़ा बेवक़्त ही बजी थी/  उस अनामिका थोड़ी अलसाई सी आराम के मूड में थी/ रोजमर्रा  के काम  अभी निपटे  ही थे/ थोड़ा आराम करने के बाद, कुछ लिखने  पढ़ने की आदत सी थी /फ़िर भी सलीके का तक़ाज़ा यही थी कि दरवाज़ा खोल दिया जाये/

सो, अनमने अंदाज़ से ही सही, पर दरवाज़ा खोल के, एक हल्की सी मुस्कान ओढ़ के, उसे  अंदर आने के लिए कहा/

शहज़ादों जैसी कद-काठी, लम्बा ऊंचा क़द, सलीकेदार पहरान, हलके घुंघराले बाल, कुछ कुछ ज़िंदगी जैसे उलझे हुए और माथे पर एक आवारा लट/ उम्र होगी अंदाज़न 29 साल/ 

अपनी ज़िंदगी के किसी अहम मसले पर सलाह लेने आया था/ और इस उम्र में मसला तो अक्सर एक ही होता है/ इश्क़ का जाल, जिस में जाने अनजाने उलझ कर रह जाते हैं/ ख़ुद से बेख़बर, नहीं जानते कि अंजाम क्या होगा/ 

सहज को कुछ अंदाज़ था के इस अधेड़ महिला को अपनी दास्तान सुनाने के बाद, शायद कोई हल निकल पायेगा/  उसे यह भी मालूम था कि  यह महिला उस  लड़की से  बरसों से अच्छे से परिचित थी , क्योंकि वह उसकी सहेली की बेटी थी/

सहज ने कुछ झिझकते हुए , शुरुआत से आपबीती बतानी शुरू की/ बिना कुछ छुपाये, बिना लाग  लपेट के/ 


TO BE CONTINUED 

  बात सिर्फ इतनी सी 

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बगिया की
शुष्क घास पर
तनहा बैठी वह
और सामने
आँखों में तैरते
फूलों से नाज़ुक
किल्कारते बच्चे

बगिया का वीरान कोना
अजनबी का
वहाँ से गुजरना
आंखों का चार होना

संस्कारों की जकड़न 
पहराबंद
उनमुक्त धड़कन
अचकचाए
शब्द
झुकी पलकें
जुबान खामोश
रह गया कुछ
अनसुना,अनकहा

लम्हा वो बीत गया
जीवन यूँ ही रीत गया

जान के भी
अनजान बन
कुछ
बिछुडे ऐसा
न मिल पाये
कभी फिर
जंगल की
दो शाखों सा

आहत मन की बात
सिर्फ इतनी
तुमने पहले क्यों
न कहा

वह  आदिकाल
से अकेली
वो अनंत काल
से उदास
और सामने
फूलों से नाज़ुक बच्चे
खेलते रहे/