Saturday, April 25, 2026

गर तुम साथ होते

 यह हसरत ही रही कि ज़िन्दगी के राहों पे साथ तेरा होता 

पार कर जाते हँसते हुए सहरा दर सहरा , गर हाथों में हाथ तेरा होता 


मुझे मिली हैं नसीब में जो स्याह दर स्याह रातें , गर तुम साथ होते 

स्याह रातों के बाद उजला सवेरा होआ 


ज़िंदगी हैं मेरी , तेरी छोड़ी हुई अधूरी क़िताब 

गर तुम साथ होते, मुक़्क़मल यह अफसाना मेरा होता/


रजनी छाबड़ा 


मन के बाजार में

 टूट कर जुड़ भी जाएँ, तो दरार दिखती है 

मन के बाजार में फिर नहीं वो शै बिकती है 


यूँ तो चाँद की चाँदनी बिखरती है सारे जहां पर 

ग्रहण लगे चाँद से चांदनी नहीं रिसती है 


दुनिया के लिए वही सुबह, वही है शब 

बाद तेरे मेरी हर सुबह शब् जैसी, हर शबे गम सिसकती है 


धुँधला रहे तेरे नक़्श ए पाँ, वक़्त की रेत में 

अब रास्ता ही रास्ता है , मंज़िल नहीं दिखती है/


रजनी छाबड़ा 

Friday, April 24, 2026

नम हवाएं

नम हवाएं 


हवाओं में नमी है 

 मेरी नम आँखों जैसी 

क्या उन पर भी 

 किसी की जुदाई का 

असर छाया है ?



haiku 2

Hawaon mein name hai, meri nm.aankhon. jaisee

Kya un pr kisee zudai ka asar chhaya hai

महकी फ़िज़ाएं

 जुबां शीरीं हो गयी है 

आँखों में ख़ुमार उतर आया है 


चंद शबनमी क़तरे मिले ताज़ा कली से 

अठखेलियों का मौसम आया है 


महकी लगती हैं फ़िज़ाएं 

बहार पर निख़ार उतर आया है 


तुम भी महसूस कर रहे हो शिद्दत से 

या फिर मुझ ही पे खुमार उतर आया है/


रजनी छाबड़ा 

Haiku 1


Jubban sheeren ho gayi  hai, aankhon mein khumaar uttar aaya hai

Chnd shabnamee qatre gale milee taza kali se, athkheliyon ka mousam aaya hai

Mahkee lagtee hai fizayen, Bahar pe nikhar uttar aaya hai

Tum bhee mahsus kr rho shiddat se

Ya phir mujh pr hee khumaar uttar aaya hai

Rajni Chhabra 




Tuesday, April 14, 2026

रोगी कैसे रहता है निरोगी ?

 रोगी कैसे रह सकता है निरोगी 

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कुछ वर्ष पुरानी घटना आप सब के साथ सांझा कर  रही हूँ; एक ऐसी सत्य घटना जो आप में एक सकरात्मक सोच का संचार करेगी/

मैं अस्पताल में भर्ती थी , कुछ गंभीर स्वास्थ्य सम्बंधित समस्या के कारण/ कुछ न कुछ मेडिकल परीक्षण होते रहते थे/ परिणाम आने तक मन आशंकित ही रहता था/ मन में कई तरह के सवाल उठते रहते थे/ कब पूरी तरह से स्वस्थ हो पाऊंगी/ कब  सामान्य जीवन फिर से जी पाऊँगी ?

मेरे साथ वाले बेड पर जो रोगी था, उसका बहुत भयानक एक्सीडेंट हुआ था, जिस कारण उसे लम्बे आरसे के लिए अस्पताल में रहना ज़रूरी था/ उसके बहुत से फ्रैक्चर हुए थे, कुछ दाँत भी टूट गए थे; चेहरे पर भी चोट के निशान अभी भी गहरे थे ; शरीर के कुछ अन्य अंगों पर भी चोटें आयी थी/ खुद हिलना , डुलना भी उसके बस की बात नहीं थी/ करवट भी नहीं ले पाता था/ रुचिकर भोजन तो अब जैसे उसके नसीब में ही नहीं था, एक लम्बे  अरसे के लिए/ इस सब के बावज़ूद , कभी उसके चेहरे पर शिकन हैं आती थी/

डॉ. साहब राउंड पर आए, रिपोर्ट्स तो देख ही चुके थे/  सामान्यत  उसका हाल चाल पूछने लगे/ उसके शांत रवैये से डॉ. साहब भी काफी प्रभावित थे/

उस से पूछा, "आपको कोई और परेशानी तो नहीं/ और कोई समस्या हो, आप मुझे बेझिझक बता सकते हैं/"

रोगी से कहा," और तो कुछ समस्या नहीं/ धीरे धीरे हालत बेहतर हो ही जाएगी/ फ़िलहाल सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब में ठहाके लगाना चाहता हूँ, दिल खोल के हँसना चाहता हूँ, तब मेरे टाँके दुखते हैं/"

रजनी छाबड़ा 

बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 


नोट:  मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/

रजनी छाबड़ा 


 


Monday, April 6, 2026

यूं भी क्या जीना/?


यूं भी क्या जीना?

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ब्रह्मा का एक परम भक्त रात दिन उस की आराधना में लगा रहता / उसकी आराधना से प्रसन्न हो ब्रह्मा न कहा, " वत्स ! मैं तुम्हारी निष्ठा व् भक्ति भाव से  अत्यंत प्रसन्न हूँ/ तुम मुझ से अपना मनपसंद वर मांग सकते हो; मैं सहर्ष दूंगा/"

भक्त ने कहा, " हे, प्रभु! आप मुझे वर दीजिये कि कभी भी मेरी मृत्यु न हो/" ब्रह्मा असमंजस में पड़ गए , क्योंकि यह  वर तो विधि के विधान के  विरुद्ध था/ और अगर देने से इंकार करते हैं, तब भी उनकी प्रतिष्ठा पर आँच आएगी/ इस दुविधा से उबरने का उन्होंने एक उपाय ढूँढा/ उन्होंने भक्त से कहा, "मैं विधि के विधान के विरुद्ध तो नहीं जा सकता , क्योंकि जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है/ परन्तु मैं तुम्हे यह वर देता हूँ कि तुम तब तक जीवित रहोगे, जब तक तुम ख़ुद नहीं कह दो कि तुम मरना चाहते हो/"

भक्त से इस वरदान को स्वीकार किया और आराम से, शांतिपूर्वक जीवन का आनंद लेने लगा/ परिवार में उसकी एक विशिष्ट पहचान थी/ बेटे, बहुएँ , बेटियां, दामाद और उनकी संतान, सभी उसे समुचित सम्मान देते/ वक़्त का पहिया घूमता रहा/ धीरे-धीरे शारीरिक दुर्बलता महसूस होने लगी व् मानसिक क्षमता भी अब पहले जैसे नहीं रही/  वह घर के एक छोटे से कमरे में दिन रात अकेले पड़ा रहता/ दिन में एक आध बार आकर कोई उसे भोजन परोस देता/ परन्तु कोई भी उसके साथ बातचीत के लिए वक़्त नहीं निकालता था/ उसके बाद अगली पीढ़ी आयी , जो उसे पहचानती तक नहीं थी; उसके बारे में कुछ जानती तक  नहीं थी/ क्षीण काया वाला यह व्यक्ति बस  अपनी  ही दुनिया में सिमट कर  रह गया था/ कभी आहें भरता, कभी दर्द से परेशान हो कर चीखता , कभी खांसता रहता/ कुछ खाने-पीने की भी इच्छा नहीं होती  था/ एक दिन, उसकी पाँचवी  पीढ़ी के एक बालक ने अपने पिताश्री से पूछा , " उस कोने से जिस व्यक्ति के हर वक़्त कराहने या खांसने की आवाज़ आती है, वह कौन है?" पिताश्री ने उत्तर दिया, " मैं तो ख़ुद इस बारे में कुछ नहीं जानता / जब मैंने अपने पिता जी इस बुजुर्ग के बारे में पूछा ;उन्होंने भी अनभिज्ञता व्यक्त की / उनका कहना यह था कि मेरे पिताश्री भी इस बारे में कुछ नहीं बता पाए/ बस यही बताया कि घर का कोई न कोई प्राणी उनके कमरे में भोजन पहुंचा कर, बिना कोई बातचीत किये, वापिस आ जाता है/ पीढ़ियां बीत चुकीं,सब उसकी खांसने, कराहने की आवाज़ें ही सुनते आये है/  इसके अलावा, इस व्यक्ति के बारे मैं कुछ नहीं जानता/ "

भक्त के कानों में जब यह बात पहुँची , उसे बहुत ख़ेद हुआ कि उसकी कोई पहचान नहीं; कोई उसका नाम तक नहीं  जानता/ उसका कोई अस्तित्व नहीं; उसके होने या न होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता /वह किसी के काम नहीं आ सकता और ख़ुद को भी ख़ुद नहीं संभाल सकता ; तो ऐसे जीने का क्या फायदा/ उसने ब्रह्मा को याद किया और उनसे विनती की, " हे ,प्रभु! मुझे वापिस अपने पास बुला ले/ जब मेरी कोई पहचान ही नहीं है यहां, ऐसी दुनिया में जी कर, क्या करूंगा?"

और ब्रह्मा ने उसकी पुकार सुन ली/ उसकी विनती स्वीकार करते हुए,उसे साँसों के बंधन से मुक्ति दे दी/


'ज़िन्दगी की किताब से' मेरे  कहानी संग्रह से उद्धृत एक कहानी  

रजनी छाबड़ा 

बहु-भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 

Sunday, April 5, 2026

रैगिंग

रैगिंग 

मैं अपने कॉलेज के दिनों की एक घटना आपको बताना चाहूंगी, जो  सन 1970 में घटित हुई/ ग्रेजुएशन के लिए , Govt College for Women , श्रीनगर में दाख़िला लिया था/ काश्मीरी भाषा का ज्ञान बिल्कुल भी नहीं था/ अभी किसी से भी कोई मित्रता भी नहीं हुई  थी/

उन दिनों जलशुद्धीकरण यंत्र और वाटर कूलर का चलन नहीं था/ अपनी प्यास बुझाने के लिए, नल तक जाना पड़ता था/ नल खोलिये, हथेली की ओक बनाईये और नल से सीधे ही पानी पी लीजिये/ कई बार तो नल के आगे लम्बी क़तार लगी  रहती और नल के आस पास छात्राओं  के झुंड दिखाई देते/ रैगिंग अपनी चरम सीमा पर थी/ 

जब में नल के पास अपनी बारी की प्रतीक्षा में खड़ी थी, कुछ वरिष्ठ छात्राओं ने मुझे पुकारा और मुझे  आदेश दिया कि पास में जो एक झाड़ी उगी हुए थी, उस के कुछ पत्ते तोड़ कर उनके लिए लाऊँ/ जिस क्षण मैंने पत्ते तोड़े , मेरे हाथों और बाजुओं  में बुरी तरह जलन शुरू हो  गयी, जोकि मेरे लिए बिल्कुल असहनीय थी / मैं बहुत बैचैन हो रही थी/ हाथ धोने से भी मुझे कोई राहत नहीं मिली/ इस सा समूची घटना की सब से बुरी बात यह थी कि वे निर्दयी छात्राएं मेरी इस दुर्दशा पर ठहाके लगा रही थी/ मेरी आँखों से आंसू बह निकले/

इसी समय के दौरान, कुछ और छात्रों का झुंड, उसी स्थल के करीब  आया/ उन्हें मेरी यह दुर्दशा बर्दाश्त नहीं हुई / उन्होंने मुझे तुरंत निर्देश दिया कि उस जहरीली झाड़ी के पास हे जो एक और झाड़ी उगी हुई है, मैं तुरंत उसके कुछ पत्ते तोड़ कर लाऊँ और प्रभावित अंगों पर उन्हें  रगड़ दूँ/ उन्होंने मुझे बताया कि उस झाड़ी के पत्तों में औषधीय गुण है और वे इस ज़हरीले असर को ख़त्म कर  देंगे/ मैंने उनकी बात का अनुकरण किया और यह मेरे लिए बहुत सुखःद आश्चर्य रहा कि मुझे अपनी परेशानी से तुरंत राहत मिल गयी /

मैं उन दयालु छात्राओं को हृदय तल से आभार प्रकट किया/

उस दिन से मेरे मन में एक बात गहरी पैठ गयी  कि जहां कहीं भी कोई समस्या होती है, उसका  हल भी कहीं आस  पास ही होता है/ इसके अलावा, अगर दुनिया में कुछ दुष्ट प्रवृति के लोग है, जिन्हे आपको परेशान करने में  ही आनंद मिलता है; तब प्रभु ने कुछ नेक दिल इंसान भी बनाये है , जो आपकी सहायता के लिए तत्पर रहते है/ उन बुरे लोगों को भूलने की कोशिश कीजिये और दयालु लोगों की अच्छाई को हमेशा याद रखिये/


'ज़िन्दगी की किताब से' मेरे  कहानी संग्रह से उद्धृत एक कहानी  

रजनी छाबड़ा 

बहु-भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 

Wednesday, April 1, 2026

तुम आ जाओ पास मेरे

तुम आ जाओ पास मेरे

स्वप्न अश्व पर सवार हो कर
एक लयमयी द्रुतगति से

तुम आ जाओ पास मेरे
धुन की नाव पर सवार हो कर
सुर ताल जगाते हुए

तुम आ जाओ पास मेरे
एक सूर्यकिरण का अनुगमन करते हुए
अपनी ओजस्विन मुस्कान के साथ

तुम आ जाओ पास मेरे
खुशियों से सरोबार
संग बसंत बहार

तुम आ जाओ पास मेरे
फूलों के बोझ से झुकी
शाखाओं का घूंघट उठाते हुए

तुम आ जाओ पास मेरे
तैरते हुए
एक जल परी सी

तुम आ भी जाओं ना

A TRANSVERTED POEM OF DR.SHYMAL MAJUMDER (ORIGINALLY COMPOSED IN BENGALI रजनी छाबड़ा

Friday, March 27, 2026

तपते पत्थरों पर जीवन से भेंट

 







तपते पत्थरों पर ज़िंदगी से मुलाक़ात

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शहर के नन्हे परिंदे
न घरौंदा
न ही शज़र का
न अम्मी का साया
ये कैसा दौर आया
ज़मींन पर ही आशियाना बनाया

रजनी छाबड़ा



तपते पत्थरों पर जीवन से भेंट


शहर के दो नन्हे पाखी
न नीड़
न तरु
और न ही
माँ का साया
यह कैसा दौर आया
सूने फर्श पर ही
बसेरा बनाया

उर्दू और हिंदी में मेरी रचना

रजनी छाबड़ा 

Saturday, March 21, 2026

क्या तुम सुन रही हो,माँ?

 क्या तुम सुन रही हो,माँ?

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माँ, तुम अक्सर कहा करती थी
बबली, इतनी खामोश क्यों हो
कुछ तो बोला करो
मन के दरवाज़े पर दस्तक दो
शब्दों की आहट से खोला करो

अब मुखर हुई हूँ
तुम ही नहीं सुनने के लिए
विचारों का जो कारवां
तुम मेरे ज़हन में छोड़ गयी
वादा  है तुमसे
यूं ही बढ़ते रहने दूंगी

सारी कायनात में 
तुम्हारी झलक देख
सरल शब्दों की अभिव्यक्ति को
निर्मल सरिता सा
यूं ही बहने दूंगी

मेरा मौन अब स्वरित
हो गया है, माँ
क्या तुम सुन रही हो?

रजनी छाबड़ा 

Friday, March 20, 2026

क्या आपको बहुत गुस्सा आ रहा है ?

क्या आपको  बहुत गुस्सा आ रहा है ?

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कभी  कभी ऐसा होता है कि अपने किसी साथी, अधिकारी,सहयोगी या रिश्तेदार की जाने अनजाने  कही कोई बात हमें चुभ जाती हैं/ हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं / कभी तो तेज़ गुस्सा आता है प्रतिक्रिया के रूप में और कभी मन बहुत आहात हो जाता है/ लगता है की आक्रोश में आकर, हम उस व्यक्ति को खूब खरी -खोटी सुना डालें और अपने मन का गुब्बार निकाल डालें/ 

परन्तु थोड़ा ठन्डे दिमाग से सोचिये कि क्या इस समस्या का एक मात्र यही समाधान है/ सब से पहले यह सोचिये कि इस स्थिति की शुरुआत कहीं आपकी ही वजह से ही तो नहीं हुई/

अगर आपको आत्म-विश्लेषण के बाद महसूस हो रहा हैं कि ग़लती या ज़्यादती सामने वाले की है; आप क्रोध पर नियंत्रण करने की कोशिश कीजिये/ अपनी मुठियाँ कस कर भींच लीजिये/ अब आप कहीं ऐसा तो नहीं सोचने लग गए कि मैं आपको उस व्यक्ति को पीटने की और मुक्केबाजी के सलाह देने वाली हूँ/ जी, नहीं; बिल्कुल भी नहीं/

आप कस कर मुठियाँ भींचिये और फिर सोचना शुरू कीजिये कि क्या उस व्यक्ति ने ज़िन्दगी में कभी भी आपकी कोई भलाई की थी; कोई सहायता की थी ; मानसिक राहत देने के लिए कोई कोशिश की थी , आपको असमंसजस की स्थिति से उबारने में कोई मदद की थी/ सोचते सोचते भिंची हुए मुठियाँ खुद धीरे धीरे खुलने लग जाएंगी , जब आपको उसकी कोई नेकी याद आ जाएगी और गुस्से पर स्वतः नियंत्रण हो जाएगा/ 

वैसे भी कम से कम एक ग़लती तो माफ़  कर ही देनी चाहिए; खुद भी मानसिक तनाव से थोड़ी राहत मिल जाती है/

71 वर्ष तक ज़िंदगी की धूप छाओं देखने के बाद , यह सलाह दे रही हूँ; आजमा कर  देखिएगा/

('ज़िन्दगी की किताब से ' लघु कथा संग्रह का एक अंश/)

रजनी छाबड़ा 

बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवदिका 

20 /३/2026 

Sunday, March 15, 2026

अँधेरे कोने में

  अँधेरे कोने में 

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पिकनिक स्पॉट की चहल पहल से दूर, एक वयोवृद्ध पार्क के अँधेरे कोने में अकेला खड़ा सिगरेट के कश लगा  रहा था/ उन्मुक्त अंदाज़ से धुंए के छल्ले उड़ा रहा था/ वह धूम्रपान का आनंद ले रहा था; इसी बीच जिज्ञासा से भरे, एक युवक ने हस्ताक्षेप करते हुए, पूछ ही डाला , 'आप यहाँ नितांत एकांत में , अँधेरे कोने में खड़े सिगरेट के कश क्यों लगा रहे हैं? बुजुर्ग ने उत्तर दिया , "मैं इस एकांत कोने में खड़ा होकर, सिगरेट इसलिए पी रहा हूँ , क्योंकि मैं नहीं चाहता की मेरा बेटा मुझे धूम्रपान करते हुए देखे/"

यकायक बुजुर्ग की निगाह उस युवक पर पड़ी , जोकि अपनी उँगलियों  में सिगरेट पकड़े हुए था और कश लगाने को आतुर था/ बुजुर्ग ने उस से  पूछा, " तुम इतने रौनक मेले से अलग थलग, खुशनुमा माहौल छोड़ कर, इस सुनसान कोने में क्या कर हो?' युवक ने उत्तर दिया, "में नहीं चाहता कि मेरे माता पिता मुझे धूम्रपान करते हुए देखें /"

@रजनी छाबड़ा 

Thursday, March 12, 2026

REVIEW OF TINKA TINKA NEH: MY HINDI POETRY BOOK

REVIEWED BY Dr. ANJU DUA GEMINI 
PUBLISHED IN SHADWAL, BI LINGUAL FORTNIGHTLY NEWSPAPER FROM BIKANER





 

Wednesday, March 11, 2026

मन का क़द

 




मन का क़द 

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सपने तो वो भी देखते हैं 

दृष्टि विहीन हैं जो 

किस्मत तो उनकी भी होती है 

जिनके हाथ नहीं होते 


हौंसले बुलन्द हो ग़र 

बैसाखियों पर चलने वाले भी 

जीत लेते हैं 

ज़िन्दगी की दौड़ 


मन का क़द 

ऊंचा रखिये 

काया तो आनी जानी है 

यह दुनिया फ़ानी है 

ज़िंदगी की 

यही कहानी है/


रजनी छाबड़ा 

6/12/2023


Tuesday, March 10, 2026

कैसे समेटूं मैं

 तुम तो सिमट कर रह गए 

इक तस्वीर में

कैसे समेटूं मैं 

अपने बिख़री तक़दीर को 


धड़कनें अब 

सदा नहीं देती 

तेरी तस्वीर से 

और अनजान हूँ मैं 

अपनी धड़कनों की 

तक़दीर से 

(पुरानी डायरी से )

रजनी छाबड़ा 

11 /3 /1989 

Sunday, March 8, 2026

‘तिनका-तिनका नेह’

आप सभी सुधि पाठकों को सूचित करते हुए हर्षित हूँ कि  इस काव्य संग्रह की प्रतियां आज मुझे प्राप्त हो चुकी हैं/  शीघ्र ही amazon और flipkart लिंक्स आपके साथ सांझा करूंगी/





  *प्राक्कथन*

 

तिनका-तिनका नेह’ - यह मेरा पाँचवाँ हिंदी काव्य-संग्रह आप सभी सुधि पाठकों के सादर सुपुर्द करते हुएमन में एक अनकहा-सा उल्लास और आत्मीय संतोष अनुभव कर रही हूँ।

 

इस संग्रह की आरंभिक कविताएँ प्रकृति-सौंदर्य की उन अनुभूतियों से प्रेरित हैंजो मेरे श्रीनगर प्रवास के दौरान हृदय में धीरे-धीरे उतरती रहीं। फिर समय के प्रवाह मेंराजस्थान की सुनहरी धरा पर जब काव्य-सृजन का नव-प्रवाह आरंभ हुआतो वह एक विरामहीन यात्रा बन गया - ईश्वर की कृपा और पाठकों की आत्मीय प्रतिक्रिया से संबलित।

 

मैं हिंदीअंग्रेज़ीपंजाबीराजस्थानी और अपनी मातृभाषा सिराइकी में स्वतंत्र रूप से लेखन करती हूँसाथ ही हिंदीपंजाबीराजस्थानीउर्दू और नेपाली से अंग्रेज़ी में अनुवाद और अनुसृजन का कार्य भी निरंतर कर रही हूँ। हाल ही में एक महाकाव्य का अनुवाद अंग्रेज़ी से हिंदी में पूर्ण किया हैजो मेरे रचनात्मक पथ की एक और उपलब्धि है।

 

जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँरिश्तों की गरिमाअपनों का सान्निध्यस्मृतियों के मधुबनअस्तित्व की तलाश और सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व - यही तो हमारे सामाजिक परिवेश के वे ताने-बाने हैंजिनसे भावनाओं का वस्त्र बुना जाता है। जब यही ताना-बाना खंडित होने लगेतो कवि का संवेदनशील मन मौन कैसे रह सकता है?

 

मैं लिखती नहीं...

काग़ज़ पर मेरे जज़्बात बहते हैं।

कह न पाई जो कभी,

सिलेख़ामोश लबों से,

वही अनकही कहानी कहते हैं।

 

बचपन से लेकर जीवन के इस पड़ाव तकजिन अनुभवों ने मुझे छुआ - सामाजिक चिंतानगरीकरण का दबावअन्यायअसंतुलनअपनी माटी की महकजीवन-मूल्यों और संस्कारों के प्रति आस्थाप्रेमप्रतीक्षाविरह - इन सभी अनुभूतियों ने शब्दों का रूप लेकर इन कविताओं में आकार पाया है।

 

प्रकृति की हरित छांवसिंदूरी सूरजतारों जड़ी रातेंनभ और सागर का विस्तार - इन ऐंद्रिय बिम्बों ने मेरी चेतना को छुआ है। उन क्षणों को काव्यात्मक भाषा में ढालना मेरा प्रयास रहा है।

 

आज की इस आपाधापी भरी दुनिया मेंहम अपने भीतर झाँकने का समय ही नहीं निकाल पाते। मकड़ी के जाले जैसे ताने-बाने में उलझते हुएहम अपने ही बनाए जाल में खोते जा रहे हैं। ऐसे मेंआत्म-संवाद और निजता की पहचानएक आंतरिक शांति की खोज बन जाती है।

 

बेवजह सी लगती ज़िंदगी में

कोई वजह तलाशिए।

ख़ुद से लगाव

अक्सर कर देता है दूर तनाव।

हम ईश्वर की अनुपम रचना हैं-

स्वाभिमान और निजता का यह अहसास

जीवन में सार्थकता और निखार लाता है।

 

तिनका-तिनका नेह’ - यही भावना मेरे इस संग्रह का केंद्र है। नेह के उन तिनकों को समेटने का प्रयास हैजो जीवन की बिखरी स्मृतियोंसंबंधोंसंघर्षों और सुख-दुख की परतों से जुड़ते हैं। मैं इस संग्रह का मूल्यांकन अपने प्रिय पाठकों पर छोड़ती हूँ - आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए पथ-प्रदर्शक होंगी।

 

रजनी छाबड़ा

बहुभाषीय कवयित्री व अनुवादिका


Friday, March 6, 2026

स्विग्गी डिलीवरी ब्वॉय

 स्विग्गी डिलीवरी ब्वॉय  

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रात के तकरीबन ९ बजे, सैर करके वपिस आ रही थी /लिफ्ट का बटन दबाया; उसी समय एक स्विग्गी डिलीवरी ब्यॉय ने भी पैकेट हाथ में थामे , बटन दबा रहा था / मैंने पूछ लिया उस से कि कौन सी मंज़िल पर  जाओगे डिलवरी देने/  मैंने भी कोई आर्डर दिया हुआ था; सोचा अगर यह मेरा ही आर्डर डिलीवर करने जा रहा है, तो क्यों न मैं ही उस से पैकेट ले लूँ और उसका कुछ समय बचा दूँ/ परन्तु वह पैकेट किसी और का था/ 

थके माँदे उस शख़्स ने मुझे धन्यवाद दिया और थकावट  से भरी आवाज़ से बताया कि दिन भर ऑर्डर्स निपटाते निपटाते , वाहन चलाते चलाते , कई बार हाथ छिल जाते हैं, कांपने लगते हैं , परन्तु हिम्मत बनाये रखने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं/ ख़ुद को दिलासा देने के लिए फ़िलहाल यह ख़्याल काफी है कि बेटे की फ़ौज में ट्रेनिंग २ महीने में पूरी हो जाएगी ; उसके बाद यह काम  छोड़ दूंगा/ 

मुझ से रहा न गया और कह ही दिया कि काम करना एक दम से बंद मत कर देना/ उस सुलझे हुए इंसान का उत्तर सुन के कुछ राहत मिली/ " गाँव में जा कर अपनी शारीरिक सामर्थ्य जितनी, खेती बाड़ी कर लूँगा/  खेत में मज़दूरी कर  के कुछ कमाई तो होगी ही ; साथ ही साथ शुद्ध हवा में सांस ले सकूंगा/" 

उसके आत्म-विश्वास पूर्ण उत्तर से मन को राहत मिली/ उसकी कामयाबी के लिए प्रभु से प्रार्थना करूंगी /

रजनी छाबड़ा 

("अपने आस पास बिख़री ज़िन्दगी" से एक अंश )


Monday, February 23, 2026

भीड़ भरी सड़क और वृद्धा

 भीड़ भरी सड़क और वृद्धा 

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स्कूल की छुट्टी की घंटी अभी अभी बजी थी/ बालक उछलते  कूदते  मुख्य द्वार से  बाहर आये/ पैदल जाने वाले बालक , सड़क के किनारे खड़े, ट्रैफिक कम होने की  प्रतीक्षा का रहे थे/ सभी चुहलबाज़ी में व्यस्त थे/ तभी उनमें से एक बालक  का ध्यान, एक वृद्धा की ओर गया, जो हिचकिचाती हुई सड़क पर खड़ी थी और अकेले सड़क पार करने में हिचकिचा रही थी/ शायद प्रतीक्षा कर  रही थी कि कोई उसका हाथ थाम कर सड़क पार करने में उसकी सहायता कर  दे/

वह बालक तुरंत उसकी ओर गया, उसका हाथ थामा और सड़क पार करने में उसकी सहायता की/ वृद्धा ने उसे मुस्कुराते हुए आशीष दी/ 

उसके साथियों ने उस से पूछा, " तुम उसकी मदद क्यों कर रहे थे ? क्या वह तुम्हारी दादी लगती है? बालक ने तुरंत उत्तर दिया, "वह मेरी दादी नहीं है, परन्तु किसी न किसी की दादी माँ तो अवश्य है , जोकि इस समय यहां  किसी कारणवश उपस्थित नहीं है/ इसलिए, यह मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं उनकी मदद करूँ।"

@रजनी छाबड़ा 

आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 2


आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 2 


 किसान, आक्रोश से भरा, भुनभुनाता हुआ, ईश्वर से शिकायत करने लगा, "मैंने आप पर इतना विश्वास किया और आपने मुझे यह फल दिया?"

ईश्वर ने कहा," शांत मन से मेरे प्रश्नों का उतर दो/ क्या तुमने खेतों में बुवाई करने के बाद, एक बार भी पौधों की देखभाल  की; उनकी सार-सम्भाल की: क्या उन्हें समयानुसार पानी दिया या कभी खाद दी? कभी खर-पतवार हटाए?''

किसान ने उत्तर दिया ,"मैंने ऐसा तो कुछ भी नहीं किया/ बस भाग्य भरोसे बैठा रहा कि आपने वरदान दिया है तो सब ठीक ही हो जायेगा/"

ईश्वर ने उसे उसकी गलती से अवगत करवाया/ "वही पौधे तन कर खड़े हो सकते हैं, जो गर्म -सर्द हवाओं को सीना तान के झेलें/  बारिश से भी विचलित न हो और झुलसाती धूप को भी सहजता से स्वीकारें/ तभी सही समय आने पर वे परिपक़्व हो पाते है और गेंहू की बालियाँ दानो से भर जाती हैं/ साथ ही साथ किसान को भी तो परिश्रम करना पड़ता है/ मैंने तुम्हारी फसल को प्राकृतिक आपदाओं से बचाया , परन्तु श्रम करना तो तुम्हारा कर्तव्य था/ केवल भाग्य भरोसे रहने से कैसे पार पड़ेगी ?

किसान को अपनी ग़लती समझ आ गयी और उसके बाद जीवन भर उसने कभी मेहनत से मुहँ नहीं मोड़ा और न ही कभी ईश्वर के प्रति आस्था से विमुख हुआ / हर वर्ष नयी फसल उगाने से पहले, ईश्वर से प्रार्थना अवश्य करता था कि उसे उसकी मेहनत का फल दे और प्राकृतिक आपदाओं के कोप से बचाये रखे/


नोट:  मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/

रजनी छाबड़ा 


आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये :भाग 1

आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 1

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 जन जीवन से जुड़ी एक छोटी सी घटना आपके साथ सांझा कर रही हूँ, इस उम्मीद के साथ कि यह आपकी सोच को एक सार्थक दिशा देगी/

एक गांव में एक मेहनती किसान पूरे मनोयोग से अपना सारा दिन अपने खेतों में खेती-बाड़ी करते हुए बिता देता/ कड़कती धूप, झुलसाती गर्मी , बारिश, ठिठुराती सर्दी, इस सभी मौसमों को समभाव से झेलता, अपने काम में लगा रहता/  जब फसल पकती, रात रात भर खेत में चारपाई डाल के सोता, फसल की निगरानी के लिए/ अलाव भी जला लेता, ताकि जानवर भी खेत को कोई नुक्सान न पहुंचा सके और वह ख़ुद भी सुरक्षित रहे/

जैसे ही फसल की कटाई का काम समाप्त होता  और वह दो पल के लिए राहत की सांस लेता, ज़मींदार आ धमकता, अपने क़र्ज़ की वसूली के लिए / खेत बरसों से ज़मींदार के पास गिरवी थे/ आधी से अधिक फसल वो वसूल के लेता और बेचारा किसान मन मसोस के रह जाता/

एक दिन, बहुत दुखी मन से, वह ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाया/ विनती की कि उसे अगले वर्ष ख़ूब लहलहाती फसल दे/ मेहनत करते करते वह उकता चुका था / शारीरिक श्रम की शक्ति भी अब पहले जैसी नहीं थी/ ईश्वर ने उसको लहलहाती फ़सल का वरदान दे दिया/

किसान आश्वस्त हो गया और उसने सोचा कि अब कुछ आराम से जीवन  बिता लूं / पहले जैसे मेहनत की क्या ज़रूरत है/ ईश्वर ने वादा किया है तो निभाएगा ही/

उचित समय आने पर फसल तैय्यार हो चुकी थी/ लहलहाती फसल देख का किसान मन ही मन बहुत खुश था कि अब तो ज़मींदार का क़र्ज़ भी उतार लेगा और उसके बाद अपनी गृहस्थी के लिए भी कुछ अनाज बच जायेगा; आराम से गुज़र -बसर हो जाएगी/

परन्तु, जैसे ही उसने फसल काटनी शुरू की, उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा/ वह सदमे में आ गया/ गेहूं की लहलहाती बालियों में तो कुछ और ही राज़ छुपा था/ जैसे ही छटनी शुरू की, किसान यह देख कर सकते में आ गया कि गेहूँ की बालियाँ अंदर से खोखली थी/ उनमें गेहूँ का एक भी दाना न था/


कृपया शेष कहानी के लिए देखिये आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये :भाग 2 

नोट:  मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/

रजनी छाबड़ा 


 


Friday, February 20, 2026

न मत कहिये

  

न मत कहिये 

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जिन्दगी को कभी भी 

न मत कहिये 

चाहे आप ज़िन्दगी से 

खुश हों या नाख़ुश 

ज़िंदगी हमेशा आपको 

बेहतर ढंग से 

जीने का अवसर देती है 


गिला- शिक़वा करने की बजाय 

संतुष्ट रहने का प्रयास कीजिये 

ज़िंदगी आपको अवसर देगी 

कैक्टस में फ़ूल सरीखा

खिलने का 

अगर आप विश्वास 

क़ायम रखेंगे ख़ुद में 

और सृष्टिकर्ता में/


@रजनी छाबड़ा 

बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 

20 /2/2026 

Friday, February 6, 2026

उन्मुक्त उड़ान




उन्मुक्त उड़ान 

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युगों से 

पिंजरे में क़ैद 

पंछियों ने 

मुक्ति की योजना बनाई 


बहलिए से विनती की 

पिंजरे से मुक्त करने की 

नभ का विशाल विस्तार 

उन्हें मानो उकसा रहा था 

बेड़ियाँ तोड़ने के लिए 


मन ही मन भयभीत थी 

विस्तृत आकाश में 

उन्मुक्त उड़ान लेने से पहले 

जहाँ चीलें और गिद्ध भी 

अपने बड़े बड़े पंख पसारे 

नुकीली चोंच, तीखे पंजों 

और शिकार के लिए 

पैनी दृष्टि के साथ 

उन्मुक्त उड़ते रहते हैं 

कहीं उन पर 

जानलेवा हमला न कर दें 


बहलिए ने उन्हें 

चेताने की कोशिश की 

पर ज़िद पर उतारू 

चिड़ियों के समक्ष 

झुकना ही पड़ा उसे 


अलग थलग उड़ने की बजाय 

वे उड़ी झुंड में 

उनका यह चातुर्य देख कर 

अब चीलें भी 

सकते में आ गयी 


दृढ इच्छा शक्ति से भरी 

एक सुगठित सेना 

जो परवाह नहीं करती 

विषम परिस्थितियों की  

डटी रहती है चट्टान सरीखी 

उस सेना पर आक्रमण करना 

 कभी भी आसान नहीं होता 


अब बहेलियों ने भी 

बदल डाली है अपनी सोच 

ख़ुशियों से भरपूर 

फड़फड़ाते पँखों को देख 

और अपेक्षाकृत पसंद करते है 

पंछी यूं ही आनंद लेते रहें 

उन्मुक्त उड़ान का /


रजनी छाबड़ा 

बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 


Thursday, January 22, 2026

Thursday, January 8, 2026

  सृजन सेवा संस्थान , श्रीगंगानगर द्वारा साहित्यिक योगदान के लिए सृजन साहित्य सम्मान २०२६ प्रदान किया गया /

Monday, January 5, 2026

सृजन सेवा संस्थान के मासिक कार्यक्रम 'लेखक से मिलिए' की १३६ वीं कड़ी





 सृजन सेवा संस्थान के मासिक कार्यक्रम 'लेखक से मिलिए' की १३६ वीं कड़ी  के अंतर्गत  ४ जनवरी , 2026 को  श्री गंगानगर में प्रबुद्ध श्रोतागण के समक्ष काव्य प्रस्तुति, अनुवाद से सम्बंधित कुछ मुद्दों पर चर्चा एवं अंकशास्त्र से सम्बंधित कुछ पहलुँओं पर बातचीत का अवसर मिला/ मैं  सृजन संसथान के आभारी हूँ मुझे यह सुअवसर प्रदान करने के लिये/ मीडिया के प्रति भी हार्दिक आभार शानदार कवरेज के लिए/ साथ ही प्रस्तुत हैं यादगार लम्हों के कुछ चित्र/

Friday, January 2, 2026

आमन्त्रण





आमन्त्रण


 

इतना इतराया मत करो

 इतना इतराया  मत करो 

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तुम्हारी भव्यता की क़ायल हूँ मैं  
मुझे यह स्वीकारने में
 कोई हिचक नहीं 
अनगिनत तारों जैसी 
 तुम्हारी लहरें गिनना 
 मुमकिन नहीं 
और उस से भी दुश्वार है 
तुम्हारी गहराई की थाह पाना 

पर, सागर तुम इतना इतराया मत करो 
तुम रेत को अपने आवेश में 
बहा ले जा सकते हो 
चट्टान से लड़ने का हौसला 
क्या हैं  तुम में ?

सूर्य की तपन तुम्हे भी 
झेलनी पड़ती है 
पूरे चाँद की रात 
तुम्हें भी मदहोश करती है 
तुम केवल अपनी धुन के 
राजा नहीं हो सकते/

रजनी छाबड़ा