सशक्त
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मधुमखियाँ संयुक्त प्रयास से
बनाती शहद का छत्ता
क़तरा क़तरा
प्रवाहित होता
पिघलते हिमखंड से
और नदी का रूप लेता
नदियाँ समाती जाती
सागर में
और सागर बन जाता
असीम, अथाह
जन मत का सागर भी
कुछ ऐसा ही है
एकजुटता से
बनता सशक्त /
रजनी छाबड़ा
अछोर
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क्षितिज़ सा अछोर
कभी संदली बयार सा
कभी सावनी फुहार सा
कभी शोख़ बहार सा इतराता
रुपहली किरणों से भरा
चांदनी में नहाया
कभी अँधेरे को अंतस में समेटे
नागिन सा बल खाता , लहराता
अपनी धुन में मग्न
दुनियावी दस्तूरों से विमुख
हिचकोले , हिलोरे लेता
रेत सरीख़े फ़िसलते लम्हों
ख़्वाबों और ख्यालों का
एक समन्दर
मेरे अन्दर/