Thursday, May 7, 2026

NEW FILE HINDI KAVITA 20/2/2026 ONWARDS 26+1

   1. न मत कहिये 

   2. याद कीजिये वो दिन 

   3.  पिंजरे का पंछी 

  4. परछाई 

   5. चौराहा 

   6. सारथी 

  7.  प्यार और अपनत्व 

  8.  मातृत्व 

  9. सपनों का घर 

  10. रिश्तों की उम्र 

  11.एहसास

 12. कमल का अरमान 

 13. गर तुम साथ होते

14. नम हवाएं 

15. महकी फ़िज़ाएं 

16. साक्षी 

17. सशक्त 

18. ज़रा संभल संभल के 

18. ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी 

19.  दुनिया का दस्तूर यही है 

20.  युगों युगों तक 

21. प्यार इक तरफ़ा नहीं है 

22. ज़िंदगी एक ग़ज़ल थी 

23. सुलग जाती है चिंगारी सी 

24. ज़िंदगी एक ग़ज़ल थी 

25. सुकून के लिए 

last. शब्द कोश  रीत जाता है 

    

1. न मत कहिये 

**********

जिन्दगी को कभी भी 

न मत कहिये 

चाहे आप ज़िन्दगी से 

खुश हों या नाख़ुश 

ज़िंदगी हमेशा आपको 

बेहतर ढंग से 

जीने का अवसर देती है 


गिला- शिक़वा करने की बजाय 

संतुष्ट रहने का प्रयास कीजिये 

ज़िंदगी आपको अवसर देगी 

कैक्टस में फ़ूल सरीखा

खिलने का 

अगर आप विश्वास 

क़ायम रखेंगे ख़ुद में 

और सृष्टिकर्ता में/


 2. याद कीजिये वो दिन 

    ***************** 

 याद कीजिये वो दिन 

जज़्बात  उभरा करते थे 

कल-कल करते निर्झर सी 

रवानी लिए 


कलम -कागज़ उठाया

उढेल दिए जज़्बात  

सरलता से लिख डाली 

मन की हर बात 


मुँह -जबानी भी 

शब्दों को मिलती थी  रवानी 

पीढ़ी  दर पीढ़ी 

सुनाए जाते थे 

वीर गाथाएँ और कहानी 


इंसान के दिलऔर दिमाग के बीच 

नहीं था कोई कंप्यूटर 

थिरकती उँगलियों से 

थिरकते जज़्बात  

लिख दिए जाते थे 

बरबस कोरे कागज़ पर 


कंप्यूटर के चलन ने 

बदल दिया लिखने का सलीका 

किताब और पाठक का रिश्ता 

उँगलियों में लग रहे जंग 

और सूखने लगी स्याही 

लेखनी कागज़ के संग 

रह गयी अनब्याही /


3.  पिंजरे का पंछी 

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 पिंजरा ही है मेरा घर 

अब तक मन को था 

यही समझाया 

उन्मुक्त उड़ान लेते 

पंछी देख 

आज मन क्यों भरमाया 


ता उम्र पिंजरे में क़ैद पंछी 

आज़ादी के लिए गिड़गिड़ाया 

बहेलिये ने तरस खा पर 

खोल दिया पिंजरे का दरवाज़ा 

 पंछी ने कोशिश की 

पंख फ़ैला, ऊंची उड़ान लेने की 

पर क्या गगन की ऊंचाई 

छू पाया 


सहम गया 

उड़ते बाज़ को देख कर 

पिंजरे में ही 

वापिस बसने का मन बनाया/


जीने का जो अंदाज़ 

रहा बरसों 

उस की क़ैद से 

नहीं छूट पाया/


4. परछाई 

    ******

 रात में तनहा सड़क पर 

संग संग अंधेरे में 

उभरती लंबी पतली परछाई 

उदास लंबी रात सी ही होती है 

दूर तक फ़ैली हुए/  


दिन काम की व्यवस्तता में 

छोटा सा प्रत्तीत होता है 

दिन में उभरने वाली छोटी 

परछाई समान /


वक़्त वक़्त की बात है/


 5. चौराहा 

    *******

 

कौन सी  राह चुनें 

असमंजस के चौराहे पर खड़े 

नहीं सोच पाते हैं हम 

 

अतीत की कुछ हसीन यादें 

कुछ खट्टे मीठे अनुभव 

बीते कल से जुड़ाव 

 

 

अतीत के धागों में उलझे 

अपने आज को ही नहीं जी पाते हम 

आ गया है उम्र का वह पड़ाव 

आगे बढ़ने से पहले ही 

बंधी बंधी हो जाती है चाल 

 

नहीं बटोर पाते 

आने वाले कल की 

चुनौतियों का सामना 

करने का साहस 

जाने क्या रहस्य छुपे हों 

भविष्य  की आगोश में 

 

भूतवर्तमान और भविष्य  के 

तानेबाने में  जकड़े 

अपने इर्द गिर्द व्यवस्तता के 

अपने ही बनाये जाल में 

मकड़ी से उलझे 

मुक्त गति की राह अब 

हमें ही  बनानी होगी 

 

अतीत के कुछ यादगार लम्हें 

वर्तमान के कुछ स्वर्णिम पल 

भविष्य की कुछ योजनाएँ 

सहेज कर अपने पाथेय में 

आगे बढ़ता चल 

ओ! राही 

राह तुम्हे खुद राह देगी 

मंज़िल तक पहुँचने की /


6. सारथी 

*******

द्वन्द अक्सर 

हावी हो जाता है

दिल ओ दिमाग पर 

ज़िन्दगी के दोराहे पर 


दो कदम आगे बढ़ाते हैं 

कुछ हिम्मत जुटा के 

फ़िर, खुद ही पीछे 

सरक जाते हैं 

बनी बनाई राह पर 

लीक से हट के 

कुछ करने का 

इरादा क्यों  

डगमगा सा जाता है/

ओ , मेरे सारथी !

तुम्ही मेरी उलझन 

सुलझाओ ना 

मेरा स्वयं में 

विश्वास जगाओं ना 


नवीन और पुरातन में 

जंग छिड़ गयी है 

तोड़ना चाहती हूँ बेड़ियाँ 

नव विस्तार 

आह्वान कर रहा 


बदलते युग में 

तुम्हीं उचित राह 

दिखाओं ना 

ओ , मेरे सारथी!


7.  प्यार और अपनत्व 

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माँ तो बस माँ ही होती है 

प्यार और अपनत्व की मूर्ति 

दुनिया की कोई भी सम्पदा 

नहीं कर  सकती उसकी पूर्ति 


सुर्ख़ उनींदी आँखों से जब 

शिशु मचल रहा हो 

ले रहा हो करवटें 

आप बाँसुरी की 

अवरिल धुन सुना के 

या मद्धम मद्धम सुर सजा के 

कोशिश कर सकते हैं 

उसे सुलाने की 

परन्तु थपकियाँ  देकर  

लोरी गुनगुनाते हुए 

अपने वक्ष पर शिशु का 

सर टिका  कर 

उसके बालों को हौले हौले सहलाती 

माँ के वात्सल्य की गरिमा 

का नहीं है कोई सानी 


आधुनिकीकरण के इस दौर में 

रोबॉट नहीं बन सकता 

मानवीय संवेदनाओं का 

पूरक या विकल्प 

यही संवेदनायें हमारा गौरव 

निज की पहचान 

मानवता की शान/


8.  मातृत्व 

    ******

मातृत्व का अर्थ
जीवन का विस्तार
स्नेह, प्यार, आधार
विश्वास अपरम्पार
त्याग, सामंजस्य का भण्डार
सृजन से, विलीन होने तक
इस ममत्व का कभी न होता अंत
माँ जाने के बाद भी
आजीवन बसर करती
यादों में अनंत


9. सपनों का घर 

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आसान नहीं 

सपनों का घर बनाना 

तिनका तिनका जोड़ कर 

बनता है आशियाना 


वक़्त की आँधियों से 

बचाए रखना इसे 

मुमकिन तभी है 

जब दुआ शामिल हो 

अपनों की 

और रज़ा हो 

दुनिया  के

पालनहार की /


10. रिश्तों की उम्र 
     ************

मतलब के रिश्तों की उम्र 
अक्सर छोटी होती है 


उन्हें परखने के लिए 
स्वार्थ की कसौटी होती है 

निस्वार्थ रिश्ते स्वतः 
निभ जाते है आजीवन 


इन रिश्तों की साँसे 
हमारी साँसों में बसी होती हैं 



 11. एहसास

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मंद मंद बयार का आनंद लेते 

समुद्र तट पर 

अजीब से खुशी मिलती है 

क़ुदरत  के ख़ज़ाने  से 

कुछ मिलने का एहसास /


साधारण सी खुशी 

बन  जाती हैं ख़ास 

जुड़ जाता हैं जब इस के साथ
 
बचपन के लौटने का एहसास/


11. कमल का अरमान 

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साँझ के धुँधलके में 

जब क्षितिज़ 

प्रतीत होता  

धरा से मिलने को आतुर 


वादी पर  छाया जादू सा 

मनोरम दृश्यावली का 

मंद- मंद बयार 

शीतल, स्वच्छ, शांत जल 

डल झील में खिले हुए कमल 

अपने गुलाबी जादू के साथ 

मनभावन रूप से 

आँखों को लुभा रहे थे 


एक अकेला आतुर कमल 

प्रतीक्षारत था 

भ्रमर के लिए 

अपनी नाज़ुक़ पंखुरियों के साथ 

जैसे अपनी बाहें फैलाये हो 

भ्र्मर को आलिंगन के लिए 

आमंत्रित करते हुए


भ्र्मर उसके आकर्षण से मंत्रमुग्ध 

वहीं थम गया रात भर 

कमल की पंखुड़ियों की क़ैद में 


 भोर भये , पंखुड़ियां खुली 

कमल पूरे निख़ार पर था 

पर, भ्र्मर कहीं दूर उड़ गया 

कमल के क़ैद से मुक्त 


हर धुंधली शाम 

वह प्रेमातुर कमल 

प्रतीक्षारत है 

अपनी बाँहें फैलाये 

भ्र्मर की  

विलासिता भरी प्रकृति से 

बेख़बर 


प्रेमातुर कमल 

प्रतीक्षालीन है निरंतर 

अपने प्रेम -दीवाने के लिए 

परन्तु, भ्र्मर कभी भी नहीं 

 लौटता उसी फ़ूल पर 

यही उसकी जन्मजात प्रवृति  है/


प्रेमाकुल कमल और 

हरज़ाई भ्र्मर 

दोनों क़ायम हैं 

अपने अपने स्वभाव पर /


13. गर तुम साथ होते

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 यह हसरत ही रही कि ज़िन्दगी के राहों पे साथ तेरा होता 

पार कर जाते हँसते हुए सहरा दर सहरा , गर हाथों में हाथ तेरा होता 


मुझे मिली हैं नसीब में जो स्याह दर स्याह रातें , गर तुम साथ होते 

स्याह रातों के बाद उजला सवेरा होता/


ज़िंदगी हैं मेरी , तेरी छोड़ी हुई अधूरी क़िताब 

गर तुम साथ होते, मुक़्क़मल यह अफसाना मेरा होता/



14. नम हवाएं 

      *******

हवाओं में नमी है 

 मेरी नम आँखों जैसी 

क्या उन पर भी 

 किसी की जुदाई का 

असर छाया है ?


 

15. महकी फ़िज़ाएं 

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जुबां शीरीं हो गयी है 

आँखों में ख़ुमार उतर आया है 


लरज़ते लबों पे 

तुम्हारा नाम उतर आया है 


शबनमी क़तरे मिले ताज़ा कली से 

अठखेलियों का मौसम आया है 


महकी लगती हैं फ़िज़ाएं 

बहार पर निख़ार उतर आया है 


तुम भी महसूस कर रहे हो शिद्दत से 

या फिर मुझ ही पे खुमार उतर आया है/


16. साक्षी 

    *****

मुझे उम्र छुपाने में नहीं 

उम्र जताने में 

सुकून  मिलता है/


क्यों अपने चेहरे को 

मेक अप के आवरण से 

ढकने की कोशिश करना 

यह जो चेहरे पर झुर्रियां 

झलकने लगी हैं 

यह तो खूबसूरत साक्षी हैं 

ज़िन्दगी के धूप छाँव के पलों की 


यह आड़ी तिरछी रेखाएं 

इंगित करती है गिनती 

उन तजुर्बों की 

जो हमने बरसों 

ज़िंदगी के सफर में बटोरे 


कंधे भी झुकने लगें हैं 

थोड़ा थोड़ा, शायद 

तजुर्बों की गठरी के बोझ से 


इस आपाधापी भरे जीवन में 

हर एक के नसीब में नहीं होता 

यह मुक़ाम /



17. सशक्त 

    ******

मधुमखियाँ संयुक्त प्रयास से 

बनाती शहद का छत्ता 


क़तरा क़तरा  

प्रवाहित होता 

पिघलते हिमखंड से  

और नदी का रूप  लेता 


नदियाँ समाती जाती 

सागर में 

और सागर बन जाता 

असीम, अथाह 


जन मत का सागर भी 

कुछ ऐसा ही है 

एकजुटता से 

बनता सशक्त /




16. उन्मुक्त उड़ान 

   ************

युगों से 

पिंजरे में क़ैद 

पंछियों ने 

मुक्ति की योजना बनाई 


बहलिए से विनती की 

पिंजरे से मुक्त करने की 

नभ का विशाल विस्तार 

उन्हें मानो उकसा रहा था 

बेड़ियाँ तोड़ने के लिए 


मन ही मन भयभीत थी 

विस्तृत आकाश में 

उन्मुक्त उड़ान लेने से पहले 

जहाँ चीलें और गिद्ध भी 

अपने बड़े बड़े पंख पसारे 

नुकीली चोंच, तीखे पंजों 

और शिकार के लिए 

पैनी दृष्टि के साथ 

उन्मुक्त उड़ते रहते हैं 

कहीं उन पर 

जानलेवा हमला न कर दें 


बहलिए ने उन्हें 

चेताने की कोशिश की 

पर ज़िद पर उतारू 

चिड़ियों के समक्ष 

झुकना ही पड़ा उसे 


अलग थलग उड़ने की बजाय 

वे उड़ी झुंड में 

उनका यह चातुर्य देख कर 

अब चीलें भी 

सकते में आ गयी 


दृढ इच्छा शक्ति से भरी 

एक सुगठित सेना 

जो परवाह नहीं करती 

विषम परिस्थितियों की  

डटी रहती है चट्टान सरीखी 

उस सेना पर आक्रमण करना 

 कभी भी आसान नहीं होता 


अब बहेलियों ने भी 

बदल डाली है अपनी सोच 

ख़ुशियों से भरपूर 

फड़फड़ाते पँखों को देख 

और अपेक्षाकृत पसंद करते है 

पंछी यूं ही आनंद लेते रहें 

उन्मुक्त उड़ान का /


17. ज़रा संभल संभल के चल 

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 वो जो चंद रोज़ पहले थे अजनबी 

यकायक दिल को बहलाने लग जाते है 

ज़रा संभल संभल के चल, ए दिल!

यहाँ छोटी छोटी बात के 

अफ़साने बन जाते हैं 


झड़ने लगते हैं फूल 

तुम्हारे अल्फाज़ो से 

प्यार की खुशबू छुपाना 

हो जाता है मोहाल 


बंद आँखों से भी 

दिखाई देता है वो 

और खोल ले गर आँखें 

लोग पढ़ने लगते हैं 

तुम्हारे आँखों से 

तुम्हारे दिल का हाल '



 18.  ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी 

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ज़िन्दगी यूं तो बसर नहीं होगी 

तुम तन्हा और मैं तन्हा 


जंगल की  दो शाखों सा 

जो कभी मिल के भी नहीं मिलते 


अधूरी हैं तमन्ना, अधूरी मिलन की आरज़ू 

फ़ूल अब खिल कर भी नहीं खिलते 


तुम्हारे बिना दिल यूं रहे बेक़रार 

दिन उगते ही, शाम ढलने का रहे इंतज़ार 


मन की खुली सीप में गिरी जो बूँद 

प्यार के सच्चे  मोती सी संजोयी 


क्या अब शूल बन रह जाएगी 

ता-उम्र हमें तड़पाएगी 


दुनिया क्यों ही सितम करती रहेगी 

और आशिकों पर क़यामत आएगी 



19.  दुनिया का दस्तूर यही है 

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या, ख़ुदा !

दीन दुनिया के  

रस्मों रिवाज़ 

क्यों प्यार करने वालो से 

रहते नाराज़ 


खुशनसीब हैं परिंदे 

जिन्हें नहीं कोई बंदिशे 

जब चाहा पंख पसारे 

भर ली उन्मुक्त उड़ान 

कोई उनसे नहीं पूछता सवाल 

किसे के साथ विचर रहे थे तुम दिन भर 

किस पेड़ पर बिताई तुमने सारी रात 


इंसानो  की तो ज़िन्दगी ही रीत जाती है 

दुनियावी दस्तूरों की बेड़ियाँ के बंधन में 

दस्तूर हावी हो जाते हैं उन्मुक्त जीवन पर 




युगों युगों तक 

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 ज़िंदगी की किसी अनजानी राहगुज़र पर 

मिल जाये जब यकायक मनचाहा हमसफर 

कहता हैं मन, कभी थमे न यह सफर 

एक एक पल , बन जाये एक युग का 

और सफर चलता रहा युग-युगान्तर /


20.  प्यार इक तरफ़ा नहीं है 

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 सुर सजते हैं जब 

मन के तार बजते हैं 


लहरें अठखेलियाँ करती 

सागर के साथ  

सागर को भी देती विस्तार 

प्यार इक तरफ़ा नहीं है 


पावस की बूँद की आस 

चातक सहेजे रखता प्यास 

चाहे कितनी भी हो दुश्वारियां 

ऐसी ही सच्चे आशिकों की यारियां/


 सुलग जाती है चिंगारी सी 

*******************

दफ़न हुई यादों की राख से 

क्यों सुलग जाती है चिंगारी सी 


ज़िक्र होता है जब भी तेरा जाने अनजाने 

नहीं थमते आंसूं फिर किसी बहाने 


क्यों सुलगता रहता हैं हर पल मन मेरा 

आसूँ भी इस आग को  पानी देने में नाकाम है 

क्या अधूरी हसरतों का यहीं अंजाम है/

 


 ज़िंदगी एक ग़ज़ल थी 

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वह रहगुज़र, हमसफ़र थे जिस पर तुम 

क्यों यकायक मुझे तनहा कर  गयी 


वह नागिन सी बल खाती राहें

जहाँ चलते थे हम थामे हाथ 

डसती हैं अब मुझे 

छूटा जब से तुम्हारा साथ 


मदमस्त बहार, प्यार का ख़ुमार 

क्यों उजड़ा अचानक मेरा संसार 


ज़िंदगी एक ग़ज़ल थी 

अब अफसाना बन गयी 

नियामत थी साथ तेरे 

बाद तेरे साँस लेने का बहाना बन गयी /



सुकून के लिए 

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निगाहों को झुकाये रखने की आदत डालिये 

जाने कब कौन क्या कयास लगा डाले 


जुबां को खामोश रहने की आदत सी हो गयी 

दुनिया ने इतने बेगैरत सवाल उछाले 


अब तो फूँक फूँक कर कदम उठाने पड़ते है 

दुनिया ने राह में इतने शूल बिछा डाले 


 भूल जाना बेहतर हैं उन्हें 

जिन्होंने आपकी राहों में पत्थर उछाले 


सुकून के लिए याद रखिये उन्हें 

जिन्होंने सहलाये आप के पावों के छाले /


26. किसे परवाह रहती है

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 किसे परवाह रहती है, आँधियों की 

इक बड़े तूफ़ान के बाद 

हर ग़म छोटा हो जाता हे 

इक उस से बड़े ग़म  के बाद 


क़ुबूल  है हर वो सितम 

जो भी मिले तेरे आशियाने से

अब तो तू सितम भी करे 

वो करम होगा 

यूं तो सितम बहुत सहे हैं 

इस ज़माने के 


बीज ज़मीन में दफ़न हो के भी, फ़ना नहीं होता 

पनपता है दोबारा, गुल ए गुलज़ार में 

मिलना और बिछड़ना, दस्तूर है फख्त ज़िंदगी का 

फिर मिलेंगे हम मौसम ऐ बहार में /


रजनी छाबड़ा 




रजनी छाबड़ा 

बहुभाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 


LAST POEM.

 शब्द कोश  रीत जाता है 

******************

कैसे गुणगान करूँ मैं 

तुम्हारे अपरिमित सौंदर्य का 

तुम्हारे पावन, सुरमई आलोक का 

तुम्हारी मनभावन छवि 

तुम्हारे सौम्य स्वरूप का 


ओस की बूंदे, गुलाबी पंखुरियों से तुम्हारे लबों पर 

नृत्य करती, थरथराती 

बरखा की बूंदे, तुम्हारे हरित परिधान को 

सजाती -सँवारती, निखारती  

मेघ राशि तुम्हारे घने काले केशों को धोती 

मंद- मंद बयार 

तुम्हारे गालों  को सहलाती 

अठखेलियाँ करती तुम्हारे संग


तुम्हारे शोख नयनों को 

और भी कजरारा करते 

मदमस्त बादल 

उनमें अपना अक़्स छोड़ कर 

इठलाती, बल खाती नदियाँ 

अपनी रवानगी से, चार चाँद लगातीं 

तुम्हारी मंत्र -मुग्ध करती चाल में 


दिन में, सूर्य अपनी सुनहरी रंगत से 

कर  देता तुम्हारी काया सोनाली 

और सांझ ढले 

अपनी सिंदूरी किरणों से 

आतुर रहता 

तुम्हारी मांग भरने के लिए 

धीमे क़दमों  से आती रात के साथ 

चाँद, तारो की बारात लिए आता 

तुम्हें प्रेम निमंत्रण देने 


तुम प्रकृति की साम्राज्ञी 

मैं  शब्दों का विनीत पुजारी 

प्रयास रत हूँ , तुम्हारी छवि 

शब्दों में उकेरने के लिए 

परन्तु 

 हे,वनदेवी!

मेरी आँखों में क़ैद 

मेरी मन की अथाह गहराईयों में उतरे 

इस आलौकिक स्वरूप को 

शब्दों में पिरोने के प्रयास में 

हर बार रह जाता हैं कुछ अनकहा 

शब्द-कोश  रीत जाता है/