किसे परवाह रहती है, आँधियों की
इक बड़े तूफ़ान के बाद
हर ग़म छोटा हो जाता हे
इक उस से बड़े ग़म के बाद
क़ुबूल है हर वो सितम
जो भी मिले तेरे आशियाने से
अब तो तू सितम भी करे
वो करम होगा
यूं तो सितम बहुत सहे हैं
इस ज़माने के
बीज ज़मीन में दफ़न हो के भी, फ़ना नहीं होता
पनपता है दोबारा, गुल ए गुलज़ार में
मिलना और बिछड़ना , दस्तूर है फख्त ज़िंदगी का
फिर मिलेंगे हम मौसम ऐ बहार में
रजनी छाबड़ा
No comments:
Post a Comment