युगों युगों तक
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ज़िंदगी की किसी अनजानी राहगुज़र पर
मिल जाये जब यकायक मनचाहा हमसफर
कहता हैं मन, कभी थमे न यह सफर
एक एक पल , बन जाये एक युग का
और सफर चलता रहा युग-युगान्तर /
(पुरानी डायरी के पन्नों से)
रजनी छाबड़ा
सुर सजते हैं जब
मन के तार बजते हैं
लहरें अठखेलियाँ करती
सागर के साथ
सागर को भी देती विस्तार
प्यार इक तरफ़ा नहीं है
पावस की बूँद की आस
चातक सहेजे रखता प्यास
चाहे कितनी भी हो दुश्वारियां
ऐसी ही सच्चे आशिकों की यारियां/
बहुभाषीय कवयित्री व् अनुवादिका