युगों युगों तक
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ज़िंदगी की किसी अनजानी राहगुज़र पर
मिल जाये जब यकायक मनचाहा हमसफर
कहता हैं मन, कभी थमे न यह सफर
एक एक पल , बन जाये एक युग का
और सफर चलता रहा युग-युगान्तर /
(पुरानी डायरी के पन्नों से)
रजनी छाबड़ा
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