दुनिया का दस्तूर यही है
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या, ख़ुदा !
दीन दुनिया के
रस्मों रिवाज़
क्यों प्यार करने वालो से
रहते नाराज़
खुशनसीब हैं परिंदे
जिन्हें नहीं कोई बंदिशे
जब चाहा पंख पसारे
भर ली उन्मुक्त उड़ान
कोई उनसे नहीं पूछता सवाल
किसे के साथ विचर रहे थे तुम दिन भर
किस पेड़ पर बिताई तुमने सारी रात
इंसानो की तो ज़िन्दगी ही रीत जाती है
दुनियावी दस्तूरों की बेड़ियाँ के बंधन में
दस्तूर हावी हो जाते हैं उन्मुक्त जीवन पर
रजनी छाबड़ा
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