Saturday, March 7, 2026

‘तिनका-तिनका नेह’

आप सभी सुधि पाठकों को सूचित करते हुए हर्षित हूँ कि  इस काव्य संग्रह की प्रतियां आज मुझे प्राप्त हो चुकी हैं/  शीघ्र ही amazon और flipkart लिंक्स आपके साथ सांझा करूंगी/





  *प्राक्कथन*

 

तिनका-तिनका नेह’ - यह मेरा पाँचवाँ हिंदी काव्य-संग्रह आप सभी सुधि पाठकों के सादर सुपुर्द करते हुएमन में एक अनकहा-सा उल्लास और आत्मीय संतोष अनुभव कर रही हूँ।

 

इस संग्रह की आरंभिक कविताएँ प्रकृति-सौंदर्य की उन अनुभूतियों से प्रेरित हैंजो मेरे श्रीनगर प्रवास के दौरान हृदय में धीरे-धीरे उतरती रहीं। फिर समय के प्रवाह मेंराजस्थान की सुनहरी धरा पर जब काव्य-सृजन का नव-प्रवाह आरंभ हुआतो वह एक विरामहीन यात्रा बन गया - ईश्वर की कृपा और पाठकों की आत्मीय प्रतिक्रिया से संबलित।

 

मैं हिंदीअंग्रेज़ीपंजाबीराजस्थानी और अपनी मातृभाषा सिराइकी में स्वतंत्र रूप से लेखन करती हूँसाथ ही हिंदीपंजाबीराजस्थानीउर्दू और नेपाली से अंग्रेज़ी में अनुवाद और अनुसृजन का कार्य भी निरंतर कर रही हूँ। हाल ही में एक महाकाव्य का अनुवाद अंग्रेज़ी से हिंदी में पूर्ण किया हैजो मेरे रचनात्मक पथ की एक और उपलब्धि है।

 

जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँरिश्तों की गरिमाअपनों का सान्निध्यस्मृतियों के मधुबनअस्तित्व की तलाश और सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व - यही तो हमारे सामाजिक परिवेश के वे ताने-बाने हैंजिनसे भावनाओं का वस्त्र बुना जाता है। जब यही ताना-बाना खंडित होने लगेतो कवि का संवेदनशील मन मौन कैसे रह सकता है?

 

मैं लिखती नहीं...

काग़ज़ पर मेरे जज़्बात बहते हैं।

कह न पाई जो कभी,

सिलेख़ामोश लबों से,

वही अनकही कहानी कहते हैं।

 

बचपन से लेकर जीवन के इस पड़ाव तकजिन अनुभवों ने मुझे छुआ - सामाजिक चिंतानगरीकरण का दबावअन्यायअसंतुलनअपनी माटी की महकजीवन-मूल्यों और संस्कारों के प्रति आस्थाप्रेमप्रतीक्षाविरह - इन सभी अनुभूतियों ने शब्दों का रूप लेकर इन कविताओं में आकार पाया है।

 

प्रकृति की हरित छांवसिंदूरी सूरजतारों जड़ी रातेंनभ और सागर का विस्तार - इन ऐंद्रिय बिम्बों ने मेरी चेतना को छुआ है। उन क्षणों को काव्यात्मक भाषा में ढालना मेरा प्रयास रहा है।

 

आज की इस आपाधापी भरी दुनिया मेंहम अपने भीतर झाँकने का समय ही नहीं निकाल पाते। मकड़ी के जाले जैसे ताने-बाने में उलझते हुएहम अपने ही बनाए जाल में खोते जा रहे हैं। ऐसे मेंआत्म-संवाद और निजता की पहचानएक आंतरिक शांति की खोज बन जाती है।

 

बेवजह सी लगती ज़िंदगी में

कोई वजह तलाशिए।

ख़ुद से लगाव

अक्सर कर देता है दूर तनाव।

हम ईश्वर की अनुपम रचना हैं-

स्वाभिमान और निजता का यह अहसास

जीवन में सार्थकता और निखार लाता है।

 

तिनका-तिनका नेह’ - यही भावना मेरे इस संग्रह का केंद्र है। नेह के उन तिनकों को समेटने का प्रयास हैजो जीवन की बिखरी स्मृतियोंसंबंधोंसंघर्षों और सुख-दुख की परतों से जुड़ते हैं। मैं इस संग्रह का मूल्यांकन अपने प्रिय पाठकों पर छोड़ती हूँ - आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए पथ-प्रदर्शक होंगी।

 

रजनी छाबड़ा

बहुभाषीय कवयित्री व अनुवादिका


Friday, March 6, 2026

स्विग्गी डिलीवरी ब्वॉय

 स्विग्गी डिलीवरी ब्वॉय  

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रात के तकरीबन ९ बजे, सैर करके वपिस आ रही थी /लिफ्ट का बटन दबाया; उसी समय एक स्विग्गी डिलीवरी ब्यॉय ने भी पैकेट हाथ में थामे , बटन दबा रहा था / मैंने पूछ लिया उस से कि कौन सी मंज़िल पर  जाओगे डिलवरी देने/  मैंने भी कोई आर्डर दिया हुआ था; सोचा अगर यह मेरा ही आर्डर डिलीवर करने जा रहा है, तो क्यों न मैं ही उस से पैकेट ले लूँ और उसका कुछ समय बचा दूँ/ परन्तु वह पैकेट किसी और का था/ 

थके माँदे उस शख़्स ने मुझे धन्यवाद दिया और से से भरी आवाज़ से बताया कि दिन भर ऑर्डर्स निपटाते निपटाते , वाहन चलाते चलाते , कई बार हाथ छिल जाते हैं, कांपने लगते हैं , परन्तु हिम्मत बनाये रखने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं/ ख़ुद को दिलासा देने के लिए फ़िलहाल यह ख़्याल काफी है कि बेटे की फ़ौज में ट्रेनिंग २ महीने में पूरी हो जाएगी ; उसके बाद यह काम  छोड़ दूंगा/ 

मुझ से रहा न गया और कह ही दिया कि काम करना एक दम से बंद मत कर देना/ उस सुलझे हुए इंसान का उत्तर सुन के कुछ राहत मिली/ " गाँव में जा कर अपनी शारीरिक सामर्थ्य जितनी, खेती बाड़ी कर लूँगा/  खेत में मज़दूरी के के कुछ कमाई तो होगी ही ; साथ ही साथ शुद्ध हवा में सांस ले सकूंगा/" 

उसके आत्म-विश्वास पूर्ण उत्तर से मन को राहत मिली/ उसकी कामयाबी के लिए प्रभु से प्रार्थना करूंगी /

रजनी छाबड़ा 

("अपने आस पास बिख़री ज़िन्दगी" से एक अंश )