तपते पत्थरों पर ज़िंदगी से मुलाक़ात*************************
शहर के नन्हे परिंदे
न घरौंदा
न ही शज़र का
न अम्मी का साया
ये कैसा दौर आया
ज़मींन पर ही आशियाना बनाया
रजनी छाबड़ा
तपते पत्थरों पर जीवन से भेंट
शहर के दो नन्हे पाखी
न नीड़
न तरु
और न ही
माँ का साया
यह कैसा दौर आया
सूने फर्श पर ही
बसेरा बनाया
उर्दू और हिंदी में मेरी रचना
रजनी छाबड़ा
न ही शज़र का
न अम्मी का साया
ये कैसा दौर आया
ज़मींन पर ही आशियाना बनाया
रजनी छाबड़ा
तपते पत्थरों पर जीवन से भेंट
शहर के दो नन्हे पाखी
न नीड़
न तरु
और न ही
माँ का साया
यह कैसा दौर आया
सूने फर्श पर ही
बसेरा बनाया
उर्दू और हिंदी में मेरी रचना
रजनी छाबड़ा

बहुत ही सुंदर, हृदयस्पर्शी रचना... प्यार उमड आता है...
ReplyDeleteHardik Abhaar Tejaswin i, kavita kee tah tak jane ke liye aur aapkee pyaree se tippanni ke liye
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