टूट कर जुड़ भी जाएँ, तो दरार दिखती है
मन के बाजार में फिर नहीं वो शै बिकती है
यूँ तो चाँद की चाँदनी बिखरती है सारे जहां पर
ग्रहण लगे चाँद से चांदनी नहीं रिसती है
दुनिया के लिए वही सुबह, वही है शब
बाद तेरे मेरी हर सुबह शब् जैसी, हर शबे गम सिसकती है
धुँधला रहे तेरे नक़्श ए पाँ, वक़्त की रेत में
अब रास्ता ही रास्ता है , मंज़िल नहीं दिखती है/
रजनी छाबड़ा
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