Thursday, July 1, 2010

EK DUA

एक दुआ
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वह उम्र के उस रुपहले दौर से
गुज़र रही है
जब दिन सोने के और
रातें चांदी सी
नज़र आती हैं
जब जी चाहता है
आँचल में समेट ले तारे
बहारों से बटोर ले रंग सारे
जब आईने में खुद को निहार
आता है गालों पर
सिंदूरी गुलाब सा निखार
और खुद पर ही गरूर हो जाता है
जब सतरंगी सपनों की दुनिया मे खोये
इंसान खुद से ही बेखबर नज़र आता है
जब तितली सी शोख उड़ान लिए
बगिया में इतराने को जी चाहता है
जब पतंग सी पुलकित उमंग लिए
आकाश नापने को जी चाहता है
जब मन की छोटी से छोटी बात
बताई जाती है सहेली को
जब महसूस होता है,सुलझा सकते हैं
जीवन की हर पहेली को

पर वह मासूम नहीं जानती
कितनी नादान है वह
डोर किसी हाथ में थामे बिना पतंग उड़  नहीं सकती
तितले भी बगिया में बेखौफ घूम नहीं सकती
धूमिल हो जाती है सतरंगी इन्द्रधनुषी छवि भी
सिर्फ पैदा करते हैं खुद के जज़्बात
सुनहले दिन और रुपहले तारों भरी रात

या खुदा!उसकी मासूमियत यूं हो बनाये रखना
ज़िन्दगी में आशा के दीप जलाये रखना
सतरंगी सपनों का संसार न बिखरे कभी
उसके जीवन में बहारों के रंग सजाये रखना

Tuesday, June 22, 2010

aasthaa ke but

आस्था के बुत




 
 आस्था के बुत
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हर शहर की
हर गली में
कुछ बुतखाने और
कुछ इबादतखाने होते हैं
जहां लोग
अपनी अपनी
आस्था के बुत
बना देते हैं
अपने अपने
रस्म-ओ-रिवाजों से
उनको सजा लेते हैं
बाकी दुनिया के
धर्म कर्म से फिर
 
वो बेमाने होते हैं
धीरे धीरे
इस कदर
खो जाते हैं
सतही इबादत में, कि
अपने धर्म कों
अपने ईमान से
सींचने कि बजाय
रंग देते हैं
उनके खून से
जो उनके मज़हब से
बेगाने होते हैं
आस्था के बुत
बनाते बनाते
उन्हें मालूम ही नहीं चलता
कि वो खुद कब
बुत बन जाते हैं
 
रजनी छाबड़ा

Sunday, June 20, 2010

घर

घर

प्यार औ अपनत्व
जहाँ  दीवारों की
छत बन जाता है
वो मकान
घर कहलाता है

रजनी छाबड़ा 

Monday, May 31, 2010

Baal Shramik

बाल श्रमिक
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वह जा रहा है बाल श्रमिक
अधनंगे बदन पर लू के थपेड़े सहते
तपती,सुलगती दुपहरी में ,सर पर उठाये
ईंटों से भरी तगारी
सिर्फ तगारी का बोझ नहीं
मृत आकांक्षाओं की अर्थी
सर पर उठाये
नन्हे श्रमिक के बोझिल कदम डगमगाए
तन मन की व्यथा किसे सुनाये
याद आ रहा है उसे
मां जब मजदूरी पर जाती और रखती
अपने सर पर ईंटों से भरी तगारी
साथ ही रख देती दो ईंटें उसके सर पर भी
जिन हालात मैं खुद जे रही थी
ढाल दिया उसी मैं बालक को भी
माँ के पथ का बालक
नित करता अनुकरण
लीक पर चलते चलते,
खो गया कहीं मासूम बचपन
शिक्षा  की डगर पे चलने का अवसर
मिला ही नहीं कभी
उसे तो विरासत मैं मिली
अशिक्षा की यही कटीली राह

काश! वह रोज़ी रोटी की फिक्र के
दायरे से निकल पाए
थोडा वक़्त खुद के लिए बचाए
जिसमे पढ लिख कर
संवार ले वह  बाकी की उम्र
बचपन के मरने का जी दुःख उसने झेला
आने वाले वक़्त में,वह कहानी
उसकी संतान न दोहराए
पढने  की उम्र में ,श्रमिक न बने
कंधे पर बस्ता उठाये
शान से पाठशाला जाए


Friday, May 28, 2010

ज़रा सोच लो

ज़रा सोच लो
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दूसरों को ठोकरें मारने वालो
ज़रा सोच लो एक पल को
पराये दर्द का एहसास
तुम्हे भी सालेगा तब
ज़ख़्मी हो जायेंगे
तुम्हारे ही पाँव जब
दूसरों को ठोकरें मारते मारते




रजनी छाबड़ा 

Saturday, May 15, 2010

mn ki patang

मन की पतंग


पतंग सा शोख मन
लिए चंचलता अपार
छूना चाहता है
पूरे नभ का विस्तार
पर्वत, सागर, अट्टालिकाएं
अनदेखी कर
सब बाधाएं
पग आगे ही आगे बढाएं

ज़िंदगी की थकान को
दूर करने के चाहिए
मन की पतंग
और सपनो का आस्मां
जिसमे मन भर  सके
बेहिचक, सतरंगी उड़ान

पर क्यों थमाएं डोर
पराये हाथों में 
हर पल खौफ
रहे मन में 
जाने कब कट जाएँ
कब लुट जाएँ

चंचलता, चपलता
लिए देखे मन
ज़िन्दगी के आईने
पर सच के धरातल
पर टिके कदम ही
देते ज़िंदगी को मायने


रजनी छाबड़ा 

Sunday, March 21, 2010

maa

ज़िन्दगी और

मौत के बीच

zindagi से lachaar

से पड़ी थी तुम

मन ही मन तब चाहा था मैंने

की आज तक तुम मेरी माँ थी

आज मेरी बेटी बन जाओ

अपने आँचल की छाओं मैं

लेकर करूं तुम्हारा दुलार

अनगिनत

mannaten

खुदा से कर

मांगी थी तुम्हारी जान की खैर




बरसों तुमने मुझे

पाला पोसा और संवारा

सुख सुविधा ने

जब कभी भी किया

मुझ से किनारा

रातों के नींद

दिन का चैन

सभी कुछ मुझ पे वारा

मेरी आँखों मैं गेर कभी

दो आँसू भी उभरे

अपने स्नेहिल आँचल मैं

sokhलिए तुमने

एक अंकुर थी मैं

स्नेह, ममता

से सींच कर मुझे

छाया भेरा तरु

banayaa

ज़िंदगी

भेर मेरा मनोबल

बढाया

हर विषम परिस्थिति मैं

मुझ को समझाया

वो बेल कभी न होना तुम

जो परवान चढ़े

दूसरों के सहारे

अपना सहारा ख़ुद बनना

है तुम्हे,ताकि परवान चढा

सको उन्हें जो हैं तुम्हारे सहारे




पैर तुम्हे सहारा देने की तमन्ना

दिल मैं ही रह गयी

तुम ,हाँ, तुम जिसने सारा जीवन

सार्थकता से बिताया था

कभी किसी

के आगे

सेर न झुकाया था

जिस शान से जी थी

उसी शान से दुनिया छोड़ चली

हाँ, मैं ही भूल गयीथी

उन्हें बैसाखियों के सहारे चलना

कभी नही होता गवारा

जो हर हाल मैं

देते रहे हो सहारा















ज़िन्दगी और

मौत के बीच

zindagi से lachaar

से पड़ी थी तुम

मन ही मन तब चाहा था मैंने

की आज तक तुम मेरी माँ थी

आज मेरी बेटी बन जाओ

अपने आँचल की छाओं मैं

लेकर करूं तुम्हारा दुलार

अनगिनत

mannaten

खुदा से कर

मांगी थी तुम्हारी जान की खैर




बरसों तुमने मुझे

पाला पोसा और संवारा

सुख सुविधा ने

जब कभी भी किया

मुझ से किनारा

रातों के नींद

दिन का चैन

सभी कुछ मुझ पे वारा

मेरी आँखों मैं गेर कभी

दो आँसू भी उभरे

अपने स्नेहिल आँचल मैं

sokhलिए तुमने

एक अंकुर थी मैं

स्नेह, ममता

से सींच कर मुझे

छाया भेरा तरु

banayaa

ज़िंदगी

भेर मेरा मनोबल

बढाया

हर विषम परिस्थिति मैं

मुझ को समझाया

वो बेल कभी न होना तुम

जो परवान चढ़े

दूसरों के सहारे

अपना सहारा ख़ुद बनना

है तुम्हे,ताकि परवान चढा

सको उन्हें जो हैं तुम्हारे सहारे




पैर तुम्हे सहारा देने की तमन्ना

दिल मैं ही रह गयी

तुम ,हाँ, तुम जिसने सारा जीवन

सार्थकता से बिताया था

कभी किसी

के आगे

सेर न झुकाया था

जिस शान से जी थी

उसी शान से दुनिया छोड़ चली

हाँ, मैं ही भूल गयीथी

उन्हें बैसाखियों के सहारे चलना

कभी नही होता गवारा

जो हर हाल मैं

देते रहे हो सहारा