Tuesday, July 8, 2014

समकालीन सृजन को समर्पित त्रैमासिक 'शोध दिशा ' का फेसबुक कविता अंक (अप्रैल ---जून 2014) की प्रति आज डाक द्वारा प्राप्त हुई/मेरी भी ३ कविताएं  साँझ के अँधेरे मैं,अपनी माटी ,फ़ूल आर कलियाँ                 इस संकलन मैं शामिल की गयी हैं/

फेसबुक कविता अंक अपना आप मैं एक अनूठा व् सराहनीय प्रयोग है/एक अरसे से मेरे कईं मित्रगण कवि व् मैं फेसबुक पर कविताएँ पोस्ट करते रहे हैं,परन्तु इस तरह से संकलन मैं रचनाओं को स्थान मिलना एक सुखद अनुभव है/

आभारी हूँ  माननीय डॉ गिरिराजशरण अग्रवाल (संपादक)डॉ लालित्य ललित (अतिथि संपादक ) व् डॉ मीना अग्रवाल (प्रबंध संपादक )की /इस नवाचार के लिए आप सबको साधुवाद /


रजनी छाबड़ा 

Sunday, July 6, 2014

तुम  ख़ुद पर विश्वास करो

दुनिया तुम पर विश्वास करेगीं 

Thursday, February 6, 2014

यादों के ख़जाने

तेरी यादों के ख़जाने ने,
कर दिया है
इस क़दर मालामाल


तन्हाई के लम्हों मैं भी
नहीं है
 तन्हा होने का मलाल

रजनी छाबड़ा 

Saturday, November 2, 2013

पहचान

अंधकार को अपने दामन में  समेटे
ज्यों दीप बनाता है 
अपनी रोशन पहचान

यूं ही तुम 
अश्क़ समेटे रहो खुद में  
दुनिया को दो सिर्फ मुस्कान 
अपनी अनाम ज़िंदगी को 
यूं दो एक नयी पहचान 


रजनी छाबड़ा  


Thursday, October 31, 2013

मेरी दीवाली


 मेरी दीवाली 
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तम्मनाओं की लौ से
रोशन किया
एक चिराग
तेरे नाम का
लाखों चिराग
तेरी यादों के
ख़ुद बखुद
झिलमिला उठे


रजनी छाबड़ा 

Wednesday, August 21, 2013

वीराना


वीराना

जो छूट जाते हैंइस ज़िंदगी के क़ैद से ,पा जाते  हैं इक नयी ज़िंदगी बेजान तो वो रहते है जों जीते हैं उनके बाद न रहती है कोई उमंग न तरंग रह जाता है बस वीराना हर ख़ुशी का लम्हा भी कर जाता है उदास 


रजनी छाबड़ा 


Tuesday, August 13, 2013

आस का पंछी

आस का पंछी
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मन ,इक आस का पंछी
मत कैद करो इसको ,
कैद होने लिए ,क्या
इंसान के तन कम हैं


रजनी छाबड़ा