Saturday, May 13, 2017

माँ



माँ
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मातृत्व का अर्थ
जीवन का विस्तार
स्नेह, प्यार, आधार
विश्वास अपरम्पार
त्याग, सामंजस्य का भण्डार
सृजन से, विलीन होने तक
इस ममत्व का कभी न होता अंत
माँ जाने के बाद भी
आजीवन बसर करती
 यादों में अनंत

रजनी छाबड़ा 

Friday, May 12, 2017

महसूस किया है मैंने

तुझको देखा नहीं
महसूस किया है मैंने
अनछुए स्पर्श से
सांसों में जिया है मैंने


इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, अभी अभी लिखी एक नज़म

फख्त नज़रों से दूर रहने से
कभी दिल से दूर रहा है कोई

ख़ामोश लब रहें, आँखे बोलती है
हाल ए दिल बयाँ  करने से मज़बूर रहा है कोई

तेरी याद में खाली गया न दिन कोई
यह सिलसिला रातों को भी थाम सका है कोई

नम आँखों से तुझे याद करता हैं हरदम कोई
यादो की रवानी रोक सकता है कभी कोई


रजनी छाबड़ा 

Saturday, March 25, 2017

याद करते हैं

अब भी याद करते हैं
मुझे मेरे शहर के लोग
ठीक वैसे ही जैसे
मेरी यादों में बसे हैँ


नज़र से ओझल होने से
कोई दिल से दूर नहीं होता 

Friday, March 24, 2017

रिश्तों की उम्र


रिश्तों की उम्र 

मतलब के रिश्तों की उम्र 
अक्सर छोटी होती है 


उन्हें परखने के लिए 
स्वार्थ की कसौटी होती है 

निस्वार्थ रिश्ते स्वतः 
निभ जाते है आजीवन 


इन रिश्तों की साँसे 
हमारी साँसों में बसी होती हैं 


रजनी छाबड़ा 


Wednesday, February 22, 2017

हमारे बीकानेर से , राजस्थानी और हिंदी के प्रख्यात कहानीकार - व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा को उनके राजस्थानी कहानी संग्रह 'मर्दजात अर दूजी कहाणियां ' ले लिए आज साहित्य अकादमी द्वारा भव्य समारोह में सम्मानित किया गया/

पुरस्कार ग्रहण करते हुए बुलाकी जी /


हमारे बीकानेर से , राजस्थानी और हिंदी के प्रख्यात कहानीकार - व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा को उनके राजस्थानी कहानी संग्रह 'मर्दजात अर दूजी कहाणियां ' के लिए आज साहित्य अकादमी द्वारा भव्य समारोह में सम्मानित किया गया/

पुरस्कार ग्रहण करते हुए बुलाकी जी /




It is a matter of great pride and joy that famous story writer and satirist Bulaki Sharma ji , from our Bikaner has been awarded in a grand function by Sahitya Akademi ,for his collection of Rajasthani stories MARDJAAT AR DOOJEE KAHANIYAAN

Heartiest Congrats to Bulaki Sharma ji

Monday, February 13, 2017

हम कहाँ थे,हम कहाँ जा रहे हैं

हम कहाँ थे,हम कहाँ जा रहे हैं – रजनी छाबड़ा


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हम कहाँ थे,हम कहाँ जा रहे हैं
रजनी छाबड़ा 
सुहाग के जोड़े,कुमकुम सने पग और
मेहँदी रचे हाथों से सजी संवरी दुल्हनिया
घोड़े पर सवार,सेहरे से सजे,
शाही शान से आते दुल्हे राजा
क्या ख्वाबों की बात हो जायेंगे
और चटक,जनक जननी के जज़्बात जायेंगे
अपने जिगर के टुकड़े को
निगाहों से दूर बसने देना
क्या उन्हें मनमानी का परमिट दे गया
और अभिभावक क्या
उनका जीवन साथी सुझाने में
इतने अक्षम हो गए कि
नयी पौध द्वारा,वैवाहिक जीवन से पहले ही
खुद को आजमाना ज़रूरी हो गया
रिश्ते न हुए,
हो गयी मिठाई
चख लो, भायी तो भायी
वरना ठुकराई
आदम और हव्वा की
वर्जित फल खाने की
कहानी का दोहरान
आधुनिक पीड़ी चढ़ती जायेगी
दिशाहीनता की एक और सोपान
मृगतृष्णा सी तलाश
भटकन की राह दिखती है
तन मन की बेताबी बढाती है
जीवंत विश्वास,संस्कार और परम्पराएँ
क्यों न हम यही आजमाई राह अपनाये
कानून की कलम से लिखा
लिव इन का फैसला
सर पर सवार होने न पाए
भारतीयता का परिवेश बदलने न पाए
हम भारतीय हैं, भारतीय रहेंगे
तपस्वनी धरा का यही औचित्य
सारी दुनिया को दिखलायें

ग्वालियर टाइम्स में २०१२ में प्रकाशित 
https://gwaliortimes.wordpress.com/2012/02/14/%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%A5%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%88/
रजनी छाबड़ा