Thursday, February 17, 2022

पिता ऐसे होते हैं


 

पिता ऐसे होते हैं 

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सिर्फ संवेदनाओं के धरातल पर ही नहीं 

यथार्थ की धरती पर विचरते हैं पिता 


थामे अंगुली , निज संतति की 

सहजता से चलना सिखाते है 

हर विपरीत स्थिति में भी 


फूलों की सेज जुटाने को प्रयत्नरत 

काँटों की ओर भी करते हैं इंगित 


अश्क़ आँखों में जज़्ब कर 

मुस्कुराने का हुनर सिखाते हैं

 

स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाते है 

सिर ऊंचा कर चलना सिखाते हैं/


अपने स्नेह की छतरी ताने 

जीवन की कड़ी धूप से बचाते हैं 



 

पूर्णता की चाह 

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या खुदा! 

थोड़ा सा अधूरा रहने दे 

मेरी ज़िन्दगी का प्याला

 ताकि प्रयास जारी रहे

 उसे पूरा भरने का 

जब प्याला भर जाता है लबालब 

भय रहता है उसके 

छलकने का बिखरने का

 जब प्याला रहता है अधूरा 

प्रयास रहता 

उसमे कुछ और कतरे समेटने का

 जो जूनून पूर्णता पाने के प्रयास में 

है वो पूर्णता में  कहाँ 

लबालब प्याले में

 और भरने की गुन्जायिश नही 

रहती ज़िन्दगी से और कोई ख्वाहिश नहीं 

पूर्णता बना देती संतुष्ट और बेखबर

 पूर्णता की चाह करती प्रयास को मुखर

 मुझे थोड़े से अधूरेपन में ही जीने दे

 घूँट घूँट ज़िन्दगी पीने दे 

सतत प्रयासशील ज़िन्दगी जीने दे

Wednesday, February 16, 2022

बात सिर्फ इतनी सी


बात सिर्फ इतनी सी                                                                                       

बगिया की                                                         
शुष्क घास पर
तनहा बैठी वह
और सामने
आँखों मैं तैरते
फूलों से नाज़ुक
किल्कारते बच्चे

बगिया का वीरान कोना
अजनबी का
वहाँ से गुजरना
आंखों का चार होना

संस्कारों की जकड़न 
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पहराबंद
उनमुक्त धड़कन
अचकचाए
शब्द
झुकी पलकें
जुबान खामोश
रह गया कुछ
अनसुना,अनकहा

लम्हा वो बीत गया
जीवन यूँ ही रीत गया

जान के भी
अनजान बन
कुछ
बिछुडे ऐसा
न मिल पाये
कभी फिर
जंगल की
दो शाखों सा

आहत मन की बात
सिर्फ इतनी
तुमने पहले क्यों
न कहा

वह  आदिकाल
से अकेली
वो अनंत काल
से उदास
और सामने
फूलों से नाज़ुक बच्चे
खेलते रहे


@रजनी छाबड़ा