Sunday, August 16, 2009

रिश्ता

मन और आंखों
के बीच
गहरा रिश्ता है
मन का नासूर
आँखों से
अश्क बन
रिश्ता है

बेगाने

घेर की बातें
जब निकली घेर से
इन के अफसाने
बन गए
मेरे अश्क
अब मेरे नही
छलके ज्यों ही आँख से
यह बेगाने बन गए




चिंगारी

दफ़न हुई
यादों की राख मैं
क्यों सुलग जाती है
चिंगारी सी
ज़िक्र होता है
जब भी तेरा
जाने अनजाने
नही थमते आंसूं
फिर किसी बहाने

Friday, August 14, 2009

वतन की आन

विजय दिवस पर अमर जवानों को समर्पित
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वतन की आन
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जिन्हें प्यारी होती है
देश की आन
उनके लिए क्या
मायना रखती है
अपनी जान
मारेंगे या
मर  मिटेंगे
हो जायेंगे कुर्बान
उनकी शहादत से
सलामत रहेगी
देश की शान


रजनी छाबड़ा 

Monday, August 10, 2009

लहेरें

सांझ का धुंधलका
सघन
सागेर की लहरें
और
हिचकोले लेता
तन मन
संग तुम्हारे
महसूस किया
मन ने
सागर मैं
saagar sa vistaar
असीम खुशियाँ
अनंत
प्यार
वक्त के
बेरहम
सफर
मैं
तुम, ज़िन्दगी की
सरहद
के
उस पार
सांझ के तारे
मैं

करती हूँ
तुम्हारा
दीदार
सागर आज भी वही है
वही है
सांझ का धुंधलका
सघन
हलचल नही है
लहरों
मैं
सतह लगती है
ठहरा सागर
गहरा मन
रवां
है
मन के
ashant
vicharon
ka manthan


































नजरिया

ज़िन्दगी के फिसलते लमहे
आँचल मैं न
समेत पाने की कसक
बदला नज़र आता है
वक्त का नजरिया
पूरे गिलास मैं सिमटा
आधा पानी
मन की तरंग मे दिखता
आधा भेरा
रीते लम्हों में
आधा खाली



होने से,न होने तक

होने से
न होने
तक का
अन्तराल
गहरे समेटे
अपरिमित सवाल
वापिस ही
ले लेना है
तब देते ही
क्यों हो
न मिली होती
फिरदौस
न कचोटता
लुटने का
एहसास