ज़िन्दगी
रेत का समंदर
शोख सुनहली
रूपहली
रेत सा भेरा
आमंत्रित करता सा
प्रतीत होता है
एक अंजुरी ज़िन्दगी
पा लेने की हसरत
लिए
प्रयास करती हूँ
रेत को अंजुरी मैं
समेटने का फिसलती सी लगती है
ज़िन्दगी
क्षणिक हताश हो खोल देती हूँ जब अंजुरी झलक जाता है हथेली के बीचों बीच एक इकलौता रेत का कण
जो फिसल
गए वो ज़िन्दगी के पल कभी मेरे थे ही नहीं
मेरी ज़िन्दगी का
पल तो
वो है जो जुड़ गया मेरी हथेली के बीचों बीच एक इकलौता रेत का कण बन के
आ
तू
लौट आ
वरना
मैं यूँ ही
जागती रहूंगी
रात रात भर
चाँदनी रातों मैं
लिख लिख कर
मिटाती रहूंगी
तेरा नाम
रेत पर
और हर सुबह
नींद से
बोझिल पलकें लिए
सुर्ख,उनींदी
आंखों से
काटती
रहूंगी
कलेंडर से
एक और तारीख
इस सच का
सबूत
बनते हुए
कि
एक
और रोज़
तुझे
याद किया
तेरा नाम लिया
तुझे याद किया
तेरा नाम लिया
फूलों से नाज़ुक पाँव से ठिठक ठिठक कर डगमगाते क़दमों से चलने का प्रयास पाँव ने अभी अभी तो धेरती पैर टिकना सीखा है गिरते,उठेते लचकते संभलते फिर चलते ममत्व का हाथ थामे आंखों मैं मूक अनुमोदन की आस ममत्व और स्नेह से संबल लेता प्रयास सफलता की किलकारी पैंजनिया की रुनझुन से गूंज उठती घेर फुलवारी