Monday, February 23, 2026

आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 2


आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 2 


 किसान, आक्रोश से भरा, भुनभुनाता हुआ, ईश्वर से शिकायत करने लगा, "मैंने आप पर इतना विश्वास किया और आपने मुझे यह फल दिया?"

ईश्वर ने कहा," शांत मन से मेरे प्रश्नों का उतर दो/ क्या तुमने खेतों में बुवाई करने के बाद, एक बार भी पौधों की देखभाल  की; उनकी सार-सम्भाल की: क्या उन्हें समयानुसार पानी दिया या कभी खाद दी? कभी खर-पतवार हटाए?''

किसान ने उत्तर दिया ,"मैंने ऐसा तो कुछ भी नहीं किया/ बस भाग्य भरोसे बैठा रहा कि आपने वरदान दिया है तो सब ठीक ही हो जायेगा/"

ईश्वर ने उसे उसकी गलती से अवगत करवाया/ "वही पौधे तन कर खड़े हो सकते हैं, जो गर्म -सर्द हवाओं को सीना तान के झेलें/  बारिश से भी विचलित न हो और झुलसाती धूप को भी सहजता से स्वीकारें/ तभी सही समय आने पर वे परिपक़्व हो पाते है और गेंहू की बालियाँ दानो से भर जाती हैं/ साथ ही साथ किसान को भी तो परिश्रम करना पड़ता है/ मैंने तुम्हारी फसल को प्राकृतिक आपदाओं से बचाया , परन्तु श्रम करना तो तुम्हारा कर्तव्य था/ केवल भाग्य भरोसे रहने से कैसे पार पड़ेगी ?

किसान को अपनी ग़लती समझ आ गयी और उसके बाद जीवन भर उसने कभी मेहनत से मुहँ नहीं मोड़ा और न ही कभी ईश्वर के प्रति आस्था से विमुख हुआ / हर वर्ष नयी फसल उगाने से पहले, ईश्वर से प्रार्थना अवश्य करता था कि उसे उसकी मेहनत का फल दे और प्राकृतिक आपदाओं के कोप से बचाये रखे/


नोट:  मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/

रजनी छाबड़ा 


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