शिव भजन
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अमृत जग में बाँट के, विष का प्याला पीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
भक्तों की खुशियों में , खुश हो के जीने वाले
नीलकंठ , हे, नीलकंठ !
जटाओं में पावन गंगा विराजे
कंठ में सर्प का हार साजे
भभूत का श्रृंगार किये तुम
मृग छाल के आसन पर विराजे
तुम बसते रोम रोम,सृष्टि के घट घट
हर लेना मेरी विपत्ति विकट
तुम संकटहर्ता, विघ्न विनाशक , मंगलकर्ता
रखना मुझ पर भी वरद हस्त
नीलकंठ , हे , नीलकंठ !
रजनी छाबड़ा
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