हे, विंध्यवासिनी !
हे, विपदा तारिणी !
भटकी हूँ जीवन पथ पर
नहीं दिख रही मंज़िल
तुम्ही राह दिखलाओ
माँ बिन कहे जानती हैं
अपने भक्तों के कष्ट
सुलझाती हैं बिन कहे
उनकी समस्या विकट
हे, विंध्यवासिनी !
हे, विपदा तारिणी !
तुम शक्ति की प्रतीक
मेरी आस्था तुम्हीं में
तुम्हीं मेरी प्रीत
ज़िंदगी की झुलसाती धूप में
छावं दो अपने आँचल की
हर लो मेरा संताप
हे, विंध्यवासिनी !
हे, कष्ट निवारिणी !
हे, विंध्यवासिनी !
हे, विपदा तारिणी !
रजनी छाबड़ा
गीतकार
23 /9/2027
No comments:
Post a Comment