ख़ामोशी
Tuesday, October 22, 2024
ख़ामोशी
ख़ामोशी
Wednesday, October 16, 2024
बीजी को समर्पित
बीजी को समर्पित
*************
आपका मातृत्व
जिस के स्नेह का
न कोई ओर -छोर
निश्छल प्रेम से करती
सभी को आत्म-विभोर
कौन समझायेगा हमें अब
जीने के दस्तूर
ज़िंदगी का अक्स दिखाने वाला
आईना न रहा
घर आँगन में
प्यार-बयार महकाने वाला
वट-वृक्ष न रहा/
रजनी छाबड़ा
15 /10 /2024
Friday, September 27, 2024
विलुप्त
विलुप्त
*****
वक़्त की ठहरी हुई झील में
जमने लगी है काई
विलुप्त होती जा रही
अतीत की परछाई
रजनी छाबड़ा
२७/९/२०२४
भोर की पहली किरण
लम्बे अर्से के बाद रची गयी एक कविता आप सभी सुधि पाठकों के साथ सांझा कर रही हूँ /आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/
भोर की पहली किरण
****************
मैं कोई कवि नहीं
महसूस करो मेरे भावों को
और रच दो कविता
मैं कोई गीतकार नहीं
गुनगुनाओ मुझे
और गीत बना दो
मैं कोई शिल्पकार नहीं
कच्ची माटी हूँ
घड़ लो मुझे
बहना चाहती हूँ
गुनगुनाते झरने सा
अवरोधों को हटाओ तुम
उड़ना चाहती हूँ
उन्मुक्त पाखी सी
पिंजरा बनाना छोड़ दो तुम
टिमटिमाते तारों सी
मेरी ज़िंदगी के आकाश पर
उजला चाँद बन आओ तुम
अमावसी निशांत
की आस
भोर की पहली किरण
बन जाओ तुम /
@रजनी छाबड़ा
27/9/2024
Wednesday, June 26, 2024
असर
असर
*****
रेत सुबह से लेकर
रात के आख़िरी प्रहर तक
कई रंग बदलती
सूरज के संग रहती
सुनहरी रंगत पाती
पूरा दिन
तपती -सुलगती
चाँद के संग रहती
पूरी रात
ठंडक पाती
ठंडक बरसाती
झरना बहता जब पहाड़ों से
उजली रंगत लिए
शीतल, मीठे जल से
सबकी प्यास बुझाये
पहुंचता जब मैदान में
नदी के स्वरूप में
वही पानी गंदला हो जाये
झरने का पानी
अपनी मिठास गंवाए
सोन -चिरैय्या उड़ती जब
खुले आसमान में
आज़ादी के गीत गुनगुनाये
क़ैद हो जाये जब पिंजरे में
सभी गीत भूल जाए/
- रजनी छाबड़ा
Friday, June 14, 2024
बहुत फर्क है
बहुत फर्क है अश्क बहाने और अश्क पीने में




.jpg)