Expression
Friday, November 7, 2014
अकेली ही
अकेली ही चली थी
मंज़िल की तलाश को,
लोग साथ चलने लगे,
क़ाफ़िला बढ़ता गया
सफर का लुत्फ़ आने लगा
हौसला भी बढ़ता गया
रजनी छाबड़ा
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Thursday, October 30, 2014
बहने दो जीवन को
फ़लसफ़े के फेर में
मत उलझाओ मति को
शब्दों के फेर में
मत उलझाओ गति को
बहने दो जीवन को
निर्मल निर्बाध सरिता सा
कहने दो मन के भावों को
सीधी सरल कविता सा
Friday, October 24, 2014
मेरी दीवाली
मेरी दीवाली
तम्मनाओं की लौ से
रोशन किया
एक चिराग
तेरे नाम का
लाखों चिराग
तेरी यादों के
ख़ुद बखुद
झिलमिला उठे
रजनी छाबड़ा
Tuesday, October 21, 2014
पहचान
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अंधकार को
अपने दामन मैं समेटे
ज्यों दीप बनाता है
अपनी रोशन पहचान
यूं ही तुम,
अश्क़ समेटे रहो
खुद मैं
दुनिया को दो
सिर्फ मुस्कान
अपनी अनाम
ज़िन्दगी को
यूं दो एक नयी पहचान
रजनी छाबड़ा
Thursday, October 16, 2014
तेरे बिना
तेरे बिना
दिल यूं
बेक़रार रहता है
हर दिन के शुरू
होते ही
दिन ख़त्म होने का
इंतज़ार रहता है
रजनी छाबड़ा
Wednesday, October 15, 2014
हम बिन
यूं भी क्या जीना
कि जीना
इक मज़बूरी लगे
क्यों न कर जाएँ
कुछ ऐसा
कि हमारे
जाने के बाद
यह दुनिया
हम बिन
अधूरी लगे
रजनी छाबड़ा
Sunday, September 28, 2014
http://www.globalrecorder.com/articles/art-and-culture/hindi-poetry/2014-09-28-09-04-57
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