Monday, June 23, 2025

समुद्र तट पर



समुद्र तट पर 

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नीले खुले आसमान तले 

मंद मंद बयार का आनंद लेते 

समुद्र तट पर 

सीपियाँ, शंख बटोरते 

अजीब से खुशी मिलती है 

क़ुदरत  के ख़ज़ाने  से 

कुछ मिलने का एहसास /


अपनी कल्पना शीलता से 

रेत के घरौंदे बनाते 

और उस पर अपना नाम उकेरते 

मासूम बच्चे, खिलखिलाते 

पुलकित होते देख 

सागर का विस्तार 


अगले ही क्षण 

तट से टकराती लहरें 

बहा कर  ले जाती 

उनके सपनों का आशियाना 


और सन्देश दे जाती 

 क्षण भंगुरता का/


रजनी छाबड़ा 


मेटा AI द्वारा कविता का विश्लेषण 

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Friday, June 20, 2025

अछोर



अछोर 

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 क्षितिज़ सा अछोर 

कभी संदली  बयार सा 

कभी सावनी फुहार सा 

कभी शोख़ बहार सा  इतराता 

रुपहली किरणों से भरा 

चांदनी में नहाया 

कभी अँधेरे को अंतस में समेटे 

नागिन सा  बल खाता , लहराता 

अपनी धुन में मग्न 

दुनियावी दस्तूरों से विमुख 

हिचकोले , हिलोरे लेता 

रेत सरीख़े फ़िसलते लम्हों 

ख़्वाबों और ख्यालों का 

एक समन्दर 

मेरे अन्दर/


रजनी छाबड़ा  

Wednesday, June 4, 2025

टैगिंग और हाई लाइटिंग

 

टैगिंग और हाई लाइटिंग 

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नन्हा ,अबोध शिशु 

जब नाज़ुक पैरों से 

ठुनकता हुआ 

घर आंगन में 

पहला कदम उठता है 

कभी सहारे के लिए

कभी अनुमोदन के लिए 

माँ को देखता है 

या जब नए नए बोल सीखता है 

समर्थन के लिए माँ की ओर ताकता है 

सहज स्वाभाविक है

जाने अनजाने यह प्रक्रिया

ज़िंदगी का अंग बन जाती है 


शिक्षा प्राप्ति के दौर में भी 

एक स्वभाविक चलन है 

अभिव्यक्ति और अनुशंसा 


ठीक ऐसे  ही जैसे 

 हम कलमबद्ध करते हैं 

नव- अंकुरित  विचार 

और प्रस्तुत करते है 

पाठकीय टिप्पणी हेतु 

सोशल मीडिया पर 

 कर देते हैं टैगिंग 

व् हाइलाइटिंग/


अनुमोदन का  सिलसिला 

जाने-अनजाने 

किसी न किसी बहाने 

क़ायम रहता है 

उम्र के हर दौर में/



रजनी छाबड़ा