Monday, February 10, 2025

सर्ग १ ज्ञान: खतरे का कार्यक्षेत्र COMPILED PAGE 1 to 13 COMPLETE CANTO 1 Re-Edited

A DATE WITH ETERNITY


 A DATE WITH ETERNITY


LUSTUS is a lucky chap. He was brought down from celestial spheres into Bengal by way of its translation into Bengali.


It has seen the beautiful landscape of Iran also   after its Persian translation by Dr Roghayeh Farsi, Professor of English, Univ of Neyshabur Iran.


Now, I am thankful to Dr Rajni Chhabra, noted poet, translator and Numerologist  who has decided to create it's Hindi Avataar. Trans- creating Lustus into Hindi is a great service to the cause of Indian literature for which I appreciate Dr Rajni Chhabra because translating an epic like Lustus is really a challenging  job with its Neo-Mythology and technical exoerim jientation.


I congratulate Dr Rajni Chhabra and look forward to its publication in Hindi

आह्वान

 

 LUSTUS, THE PRINCE OF DARKNESS 
BY  Dr. JERNAIL S AANAND 

TRANSCREATED BY RAJNI CHHABRA




 LUSTUS/लस्ट्स 


आह्वान

हे ! सरस्वती, मैं एक बार पुनः आपके पवित्र मंदिर में आया हूं /

मेरी लेखनी को नई ऊर्जा  दो 

मानव के पतन के कारण खोजने के लिए 

और लस्टस  के उत्थान के 

बाध्य कर दिया जिसने प्रभु और उसके शक्तिवान फ़रिश्तों को 

आत्म -विश्लेषण के लिए , क्यों परास्त होना पड़ा मानव को दानव से 

और किसने विमुख  किया मानव को 

दैवीय शक्तियों से और बाध्य किया 

लस्ट्स के  दिन प्रतिदिन बढ़ते आधिपत्य और शक्ति की 

शरण में जाने के लिए। 


लस्टस  जो इच्छुक था मानव के रवैये को देव के समक्ष उचित ठहराने का 

खिलवाढ़ कर  रहा था मानवीय मन की दुर्बलता के साथ 

सम्मान, स्वतंत्रता और इच्छा शक्ति की आड़ में 

और उसकी उच्च श्रेणी की  बौद्धिक वाकपटुता ने  

कैद कर  दी उनकी कल्पना शक्ति 

ताकि शीघ्र ही उन्हें यह आभास होने लगा 

यदि वे चाहते हैं कि मन-वांछित ही घटे 

केवल लस्टस और उसका राज्य ही है 

जो उन्हें बेलग़ाम आज़ादी दे सकते हैं/


प्रभु और उसकी दिनों-दिन क्षीण होती जा रही सेना

अपने बलपूर्वक रवैये के साथ जारी रखे हुए थी 

मृतकों की उपासना

और उनके अनुयायियों के लिए निर्धारित करती 

आचरण की एक सारणी 

जिससे आमआदमी साधारण खुशियों से भी वंचित हो जाता 


इस तरह, उन्होंने मुख मोड़ लिए मंदिरों से 

और भीड़ बढ़ ने लगी मदिरालयों, सिनेमाघरों 

रेस्त्रां और क्लबों में 

लोग,जो मुक्ति चाहते थे 

कमरतोड़ काम के बोझ से 

एकत्रित होते खेल खेलने,  महिलाओं से मिलने के लिए 

और मदिरा पान व् मौज़ मस्ती  के लिए 

परन्तु, जैसे जैसे सामूहिक अर्थव्यवस्था की पकड़ 

बढ़ने लगी, राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था पर 

अधिकाधिक युवा धकेल दिए गए नौकरियों की ओर 

जहाँ न तो उन्हें खुशी मिलती, न आशा की कोई किरण 

केवल आकांक्षा परोसी जाते उन्हें 

मात्र स्व -केंद्रित अतिरंजित जुनून 

रुग्ण मानसिकता और निरंतर दर्द से युक्त /

इन सशक्त लोगों की सेना 

जो दानव के नाम पर जी रहे थे 

दिखने में धार्मिक लगते थे 

और प्रभु के प्रति पूर्णतः समर्पित 

मंदिरों में अर्चना करते 

धार्मिक स्थलों पे सजदे में सिर झुकाते 

स्पष्ट रूप से अपनी  दमित भावनाओं से मुक्ति पाने के लिए 

फिर भी, उनकी निष्ठा तो शैतान के प्रति ही थी 

मानवीय इच्छाओं की पूर्ण स्वतंत्रता में यकीन के साथ /


हे, सरस्वती! मुझे सामर्थ्य दो वर्णन करने की 

कैसे घटित होता है यह देवत्व को लूटने का काम 

कैसे  यह दुष्ट लोग इस संसार को बदल देते हैं 

आध्पित्य हो जाता हैं अन्धकार के साम्राज्य  का, 


और कैसे दैवीय साम्राज्य के दुर्ग एक के बाद  एक 

लस्टस  के कोप के आगे  धराशायी होने लगते है, 

और किस तरह अंततः प्रभु प्रयास करता है 

अपने खोये स्वर्ग को पुनः प्राप्त करने के लिए। 


मुझे शक्तिदान दो इस अधार्मिक युद्ध के 

अनपेक्षित विवरण करने हेतु 

जोकि लस्टस  और उसके समूह ने 

प्रभु पर थोपा 

जिसमें कितने ही फ़रिश्ते घातक रूप से घायल हुए 

और, अंत में दुर्गा का आह्वान किया गया 

दानवों  के नरसंहार के लिए 

अराजकता के अंत के लिए 

और ईश्वरीय व्यवस्था के पुनर्स्थापन के लिए 



मूल रचना: डॉ. जे. एस. आनंद  

अनुवाद : रजनी छाबड़ा 


Sunday, February 9, 2025

किया तूँ सुणदी पई हें ? माँ

किया तूँ सुणदी पई  हें ? माँ   ((सिराइकी में मेरी कविता )

********************

माँ , तूँ  कयी वारी आखिया कर दी हावें 

बबली, तूँ इतनी  चुप चुपिती क्यों हें 

कुझ दा  बोलिया कर 

मन दे दरवाज़े ते खड़का कर 

शब्दां दी  दस्तक नाल खोलिया कर 


हुण  जुबान तुं  ताला हटाया हे 

तूँ ही नहि सुणनं वास्ते 

ख़यालां दा जो काफ़िला 

तूँ छोड़ गयी हें 

मेडे दिल-दिमाग वेच 

वादा हे टेडे नाल 

इवें ही अगे वधाये रखसां 


सारी दुनिया वेच टेडी झलक वेख 

सिधे सादे हरफ़ां दी पेशक़श 

साफ़ सुथरे  दरिया वरगा 

इवें  ही वगण देसां 


मेडी चुप्पी कुं होण 

जुबान मिल गयी हे 

किया तूँ सुणदी पई  हें ? माँ 


रजनी छाबड़ा 



Saturday, February 8, 2025

सिमटदे पर

 सिमटदे  पर

***********

पहाड़, समंदर, उचियाँ इमारतां 

अणदेखी कर सारियां रुकावटां

अज़ाद उड्डण दी ख़्वाहिश नु 

आ गया हे 

अपणे आप ठहराव 


रुकणा  ही न जाणदे जो कदे 

बंधे बंधे चलदे हुण ओही पैर  


उमर दा आ गया हे ऐसा मुक़ाम 

सुफ़ने थम गए 

सिमटण लगे हेन पर  

नहीं भांदे हुण नवे आसमान 


 बंधी बंधी रफ़्तार नाल 

बेमज़ा हे ज़िंदगी दा सफ़र 

 अनकहे  हरफ़ां नु 

क्यूँ न आस दी कहाणी दे देवां 

रुके रुके कदमा नु 

क्यों न फेर रवानी दे देवां /


रजनी छाबड़ा 


सूटकेस

 मित्रों, आज आप सब के साथ सांझा कर रही हूँ अंर्तराष्ट्रीय ख्यति प्राप्त  कवि व् चिंतक  डॉ. जे. एस. आंनद की इंग्लिश पोयम SUITCASE का मेरे द्वारा किया गया हिंदी में अनुवाद/ आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/


सूटकेस
********
मैं ख़ुशी से भरपूर था
अपने शोख़ रंग के साथ और अचम्भित भी
विवाहोत्सव के दौरान, मैं भरा रहूंगा
पोशाकों और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों से
यह सूटकेस विवाह के अवसर के लिए ही था


विवाह के शुभ दिन
सूटकेस की खुशी का ठिकाना न था
पोशाकों और आभूषणों से भरपूर
थिरक रहा था कक्ष में
और तब, यहाँ वहां
अंत में ठहराव पाया ससुराल के घर में


एक व्यक्ति , जोकि उस महिला का पति है
झगड़ता है उस से बात-बेबात
वह अंदर जाती है
मुझे उठाती है और भर देती है
मुझे अपने ज़रूरी सामान से
और, अरे! वह तो घर से बाहर निकल रही है

पति मुझे पकड़ लेता है
ले जाता है घर के अंदर जबरन

औरत ने झपटा मारा उसके हाथ पर
और बाध्य किया उसे मुझे छोड़ने के लिए
मैं असमंजस में था , क्या मैं
भीतर की राह लूँ या बाहर की


एक दिन, मैंने महसूस किया
पति का जानवरों जैसे बेरहम बर्ताव
औरत को मैंने खामोशी से पड़े देखा
और पति समेट रहा था
उसके शऱीर को मुझ में
और धकेलता हुआ ले गया मुझे /

हिंदी अनुवाद : रजनी छाबड़ा


Friday, February 7, 2025

SUITCASE / सूटकेस ENGLISH POEM WITH HINDI TRANSLATION



सूटकेस
********
मैं ख़ुशी से भरपूर था
अपने शोख़ रंग के साथ और अचम्भित भी
विवाहोत्सव के दौरान, मैं भरा रहूंगा
पोशाकों और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों से
यह सूटकेस विवाह के अवसर के लिए ही था


विवाह के शुभ दिन
सूटकेस की खुशी का ठिकाना न था
पोशाकों और आभूषणों से भरपूर
थिरक रहा था कक्ष में
और तब, यहाँ वहां
अंत में ठहराव पाया ससुराल के घर में


एक व्यक्ति , जोकि उस महिला का पति है
झगड़ता है उस से बात-बेबात
वह अंदर जाती है
मुझे उठाती है और भर देती है
मुझे अपने ज़रूरी सामान से
और, अरे! वह तो घर से बाहर निकल रही है

पति मुझे पकड़ लेता है
ले जाता है घर के अंदर जबरन

औरत ने झपटा मारा उसके हाथ पर
और बाध्य किया उसे मुझे छोड़ने के लिए
मैं असमंजस में था , क्या मैं
भीतर की राह लूँ या बाहर की


एक दिन, मैंने महसूस किया
पति का जानवरों जैसे बेरहम बर्ताव
औरत को मैंने खामोशी से पड़े देखा
और पति समेट रहा था
उसके शऱीर को मुझ में
और धकेलता हुआ ले गया मुझे /

हिंदी अनुवाद : रजनी छाबड़ा

 SUITCASE

Jernail Singh Anand
How happy I was
Bright in colour and all agog
There is marriage and I will remain
Filled with clothes and other objects
Of beauty.
It was a marriageable suitcase.

On the day of marriage,
The suitcase was bubbling with joy.
Filled with clothes and jewellery
Dancing in this room
And then, that,
And finally resting in the in-laws house.
Every day, two or three times,
She comes and picks me up,
And opens,
And then places her clothe in me.
I can hear some talk
Which is not clear.
A man, who is the lady's husband
Fights her over nothings,
She goes in,
Picks me up and fills me
With her necessary things
And lo, she is moving out.

The husband catches hold of me,
And forces me inside the house,
The lady clutched his hand
And forced him to leave me.
I was not sure, whether I was
To remain inside or move out.

One day, I found myself
Handled brutally by the husband
It was night,
I saw the lady lying silently.
And the husband was packing her
Body in me, and wheeled me away


Dr Jernail S Anand, author of175 plus books, is President, International Academy of Ethics, and Laureate of prestigious international awards, the Seneca Award, (Italy)The Charter of Morava,(Serbia),Franz Kafka Award (Germany, Ukraine & Chek Rep) and Maxim Gorky ,(Russia) Award. His name adorns the Poets' Rock in Serbia.(ethicsacademy.co.in) .