Wednesday, March 11, 2026

मन का क़द

 




मन का क़द 

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सपने तो वो भी देखते हैं 

दृष्टि विहीन हैं जो 

किस्मत तो उनकी भी होती है 

जिनके हाथ नहीं होते 


हौंसले बुलन्द हो ग़र 

बैसाखियों पर चलने वाले भी 

जीत लेते हैं 

ज़िन्दगी की दौड़ 


मन का क़द 

ऊंचा रखिये 

काया तो आनी जानी है 

यह दुनिया फ़ानी है 

ज़िंदगी की 

यही कहानी है/


रजनी छाबड़ा 

6/12/2023


Tuesday, March 10, 2026

कैसे समेटूं मैं

 तुम तो सिमट कर रह गए 

इक तस्वीर में

कैसे समेटूं मैं 

अपने बिख़री तक़दीर को 


धड़कनें अब 

सदा नहीं देती 

तेरी तस्वीर से 

और अनजान हूँ मैं 

अपनी धड़कनों की 

तक़दीर से 

(पुरानी डायरी से )

रजनी छाबड़ा 

11 /3 /1989 

Sunday, March 8, 2026

‘तिनका-तिनका नेह’

आप सभी सुधि पाठकों को सूचित करते हुए हर्षित हूँ कि  इस काव्य संग्रह की प्रतियां आज मुझे प्राप्त हो चुकी हैं/  शीघ्र ही amazon और flipkart लिंक्स आपके साथ सांझा करूंगी/





  *प्राक्कथन*

 

तिनका-तिनका नेह’ - यह मेरा पाँचवाँ हिंदी काव्य-संग्रह आप सभी सुधि पाठकों के सादर सुपुर्द करते हुएमन में एक अनकहा-सा उल्लास और आत्मीय संतोष अनुभव कर रही हूँ।

 

इस संग्रह की आरंभिक कविताएँ प्रकृति-सौंदर्य की उन अनुभूतियों से प्रेरित हैंजो मेरे श्रीनगर प्रवास के दौरान हृदय में धीरे-धीरे उतरती रहीं। फिर समय के प्रवाह मेंराजस्थान की सुनहरी धरा पर जब काव्य-सृजन का नव-प्रवाह आरंभ हुआतो वह एक विरामहीन यात्रा बन गया - ईश्वर की कृपा और पाठकों की आत्मीय प्रतिक्रिया से संबलित।

 

मैं हिंदीअंग्रेज़ीपंजाबीराजस्थानी और अपनी मातृभाषा सिराइकी में स्वतंत्र रूप से लेखन करती हूँसाथ ही हिंदीपंजाबीराजस्थानीउर्दू और नेपाली से अंग्रेज़ी में अनुवाद और अनुसृजन का कार्य भी निरंतर कर रही हूँ। हाल ही में एक महाकाव्य का अनुवाद अंग्रेज़ी से हिंदी में पूर्ण किया हैजो मेरे रचनात्मक पथ की एक और उपलब्धि है।

 

जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँरिश्तों की गरिमाअपनों का सान्निध्यस्मृतियों के मधुबनअस्तित्व की तलाश और सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व - यही तो हमारे सामाजिक परिवेश के वे ताने-बाने हैंजिनसे भावनाओं का वस्त्र बुना जाता है। जब यही ताना-बाना खंडित होने लगेतो कवि का संवेदनशील मन मौन कैसे रह सकता है?

 

मैं लिखती नहीं...

काग़ज़ पर मेरे जज़्बात बहते हैं।

कह न पाई जो कभी,

सिलेख़ामोश लबों से,

वही अनकही कहानी कहते हैं।

 

बचपन से लेकर जीवन के इस पड़ाव तकजिन अनुभवों ने मुझे छुआ - सामाजिक चिंतानगरीकरण का दबावअन्यायअसंतुलनअपनी माटी की महकजीवन-मूल्यों और संस्कारों के प्रति आस्थाप्रेमप्रतीक्षाविरह - इन सभी अनुभूतियों ने शब्दों का रूप लेकर इन कविताओं में आकार पाया है।

 

प्रकृति की हरित छांवसिंदूरी सूरजतारों जड़ी रातेंनभ और सागर का विस्तार - इन ऐंद्रिय बिम्बों ने मेरी चेतना को छुआ है। उन क्षणों को काव्यात्मक भाषा में ढालना मेरा प्रयास रहा है।

 

आज की इस आपाधापी भरी दुनिया मेंहम अपने भीतर झाँकने का समय ही नहीं निकाल पाते। मकड़ी के जाले जैसे ताने-बाने में उलझते हुएहम अपने ही बनाए जाल में खोते जा रहे हैं। ऐसे मेंआत्म-संवाद और निजता की पहचानएक आंतरिक शांति की खोज बन जाती है।

 

बेवजह सी लगती ज़िंदगी में

कोई वजह तलाशिए।

ख़ुद से लगाव

अक्सर कर देता है दूर तनाव।

हम ईश्वर की अनुपम रचना हैं-

स्वाभिमान और निजता का यह अहसास

जीवन में सार्थकता और निखार लाता है।

 

तिनका-तिनका नेह’ - यही भावना मेरे इस संग्रह का केंद्र है। नेह के उन तिनकों को समेटने का प्रयास हैजो जीवन की बिखरी स्मृतियोंसंबंधोंसंघर्षों और सुख-दुख की परतों से जुड़ते हैं। मैं इस संग्रह का मूल्यांकन अपने प्रिय पाठकों पर छोड़ती हूँ - आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए पथ-प्रदर्शक होंगी।

 

रजनी छाबड़ा

बहुभाषीय कवयित्री व अनुवादिका


Friday, March 6, 2026

स्विग्गी डिलीवरी ब्वॉय

 स्विग्गी डिलीवरी ब्वॉय  

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रात के तकरीबन ९ बजे, सैर करके वपिस आ रही थी /लिफ्ट का बटन दबाया; उसी समय एक स्विग्गी डिलीवरी ब्यॉय ने भी पैकेट हाथ में थामे , बटन दबा रहा था / मैंने पूछ लिया उस से कि कौन सी मंज़िल पर  जाओगे डिलवरी देने/  मैंने भी कोई आर्डर दिया हुआ था; सोचा अगर यह मेरा ही आर्डर डिलीवर करने जा रहा है, तो क्यों न मैं ही उस से पैकेट ले लूँ और उसका कुछ समय बचा दूँ/ परन्तु वह पैकेट किसी और का था/ 

थके माँदे उस शख़्स ने मुझे धन्यवाद दिया और थकावट  से भरी आवाज़ से बताया कि दिन भर ऑर्डर्स निपटाते निपटाते , वाहन चलाते चलाते , कई बार हाथ छिल जाते हैं, कांपने लगते हैं , परन्तु हिम्मत बनाये रखने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं/ ख़ुद को दिलासा देने के लिए फ़िलहाल यह ख़्याल काफी है कि बेटे की फ़ौज में ट्रेनिंग २ महीने में पूरी हो जाएगी ; उसके बाद यह काम  छोड़ दूंगा/ 

मुझ से रहा न गया और कह ही दिया कि काम करना एक दम से बंद मत कर देना/ उस सुलझे हुए इंसान का उत्तर सुन के कुछ राहत मिली/ " गाँव में जा कर अपनी शारीरिक सामर्थ्य जितनी, खेती बाड़ी कर लूँगा/  खेत में मज़दूरी कर  के कुछ कमाई तो होगी ही ; साथ ही साथ शुद्ध हवा में सांस ले सकूंगा/" 

उसके आत्म-विश्वास पूर्ण उत्तर से मन को राहत मिली/ उसकी कामयाबी के लिए प्रभु से प्रार्थना करूंगी /

रजनी छाबड़ा 

("अपने आस पास बिख़री ज़िन्दगी" से एक अंश )


Monday, February 23, 2026

भीड़ भरी सड़क और वृद्धा

 भीड़ भरी सड़क और वृद्धा 

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स्कूल की छुट्टी की घंटी अभी अभी बजी थी/ बालक उछलते  कूदते  मुख्य द्वार से  बाहर आये/ पैदल जाने वाले बालक , सड़क के किनारे खड़े, ट्रैफिक कम होने की  प्रतीक्षा का रहे थे/ सभी चुहलबाज़ी में व्यस्त थे/ तभी उनमें से एक बालक  का ध्यान, एक वृद्धा की ओर गया, जो हिचकिचाती हुई सड़क पर खड़ी थी और अकेले सड़क पार करने में हिचकिचा रही थी/ शायद प्रतीक्षा कर  रही थी कि कोई उसका हाथ थाम कर सड़क पार करने में उसकी सहायता कर  दे/

वह बालक तुरंत उसकी ओर गया, उसका हाथ थामा और सड़क पार करने में उसकी सहायता की/ वृद्धा ने उसे मुस्कुराते हुए आशीष दी/ 

उसके साथियों ने उस से पूछा, " तुम उसकी मदद क्यों कर रहे थे ? क्या वह तुम्हारी दादी लगती है? बालक ने तुरंत उत्तर दिया, "वह मेरी दादी नहीं है, परन्तु किसी न किसी की दादी माँ तो अवश्य है , जोकि इस समय यहां  किसी कारणवश उपस्थित नहीं है/ इसलिए, यह मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं उनकी मदद करूँ।"

@रजनी छाबड़ा 

आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 2


आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 2 


 किसान, आक्रोश से भरा, भुनभुनाता हुआ, ईश्वर से शिकायत करने लगा, "मैंने आप पर इतना विश्वास किया और आपने मुझे यह फल दिया?"

ईश्वर ने कहा," शांत मन से मेरे प्रश्नों का उतर दो/ क्या तुमने खेतों में बुवाई करने के बाद, एक बार भी पौधों की देखभाल  की; उनकी सार-सम्भाल की: क्या उन्हें समयानुसार पानी दिया या कभी खाद दी? कभी खर-पतवार हटाए?''

किसान ने उत्तर दिया ,"मैंने ऐसा तो कुछ भी नहीं किया/ बस भाग्य भरोसे बैठा रहा कि आपने वरदान दिया है तो सब ठीक ही हो जायेगा/"

ईश्वर ने उसे उसकी गलती से अवगत करवाया/ "वही पौधे तन कर खड़े हो सकते हैं, जो गर्म -सर्द हवाओं को सीना तान के झेलें/  बारिश से भी विचलित न हो और झुलसाती धूप को भी सहजता से स्वीकारें/ तभी सही समय आने पर वे परिपक़्व हो पाते है और गेंहू की बालियाँ दानो से भर जाती हैं/ साथ ही साथ किसान को भी तो परिश्रम करना पड़ता है/ मैंने तुम्हारी फसल को प्राकृतिक आपदाओं से बचाया , परन्तु श्रम करना तो तुम्हारा कर्तव्य था/ केवल भाग्य भरोसे रहने से कैसे पार पड़ेगी ?

किसान को अपनी ग़लती समझ आ गयी और उसके बाद जीवन भर उसने कभी मेहनत से मुहँ नहीं मोड़ा और न ही कभी ईश्वर के प्रति आस्था से विमुख हुआ / हर वर्ष नयी फसल उगाने से पहले, ईश्वर से प्रार्थना अवश्य करता था कि उसे उसकी मेहनत का फल दे और प्राकृतिक आपदाओं के कोप से बचाये रखे/


नोट:  मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/

रजनी छाबड़ा 


आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये :भाग 1

आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये : भाग 1

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 जन जीवन से जुड़ी एक छोटी सी घटना आपके साथ सांझा कर रही हूँ, इस उम्मीद के साथ कि यह आपकी सोच को एक सार्थक दिशा देगी/

एक गांव में एक मेहनती किसान पूरे मनोयोग से अपना सारा दिन अपने खेतों में खेती-बाड़ी करते हुए बिता देता/ कड़कती धूप, झुलसाती गर्मी , बारिश, ठिठुराती सर्दी, इस सभी मौसमों को समभाव से झेलता, अपने काम में लगा रहता/  जब फसल पकती, रात रात भर खेत में चारपाई डाल के सोता, फसल की निगरानी के लिए/ अलाव भी जला लेता, ताकि जानवर भी खेत को कोई नुक्सान न पहुंचा सके और वह ख़ुद भी सुरक्षित रहे/

जैसे ही फसल की कटाई का काम समाप्त होता  और वह दो पल के लिए राहत की सांस लेता, ज़मींदार आ धमकता, अपने क़र्ज़ की वसूली के लिए / खेत बरसों से ज़मींदार के पास गिरवी थे/ आधी से अधिक फसल वो वसूल के लेता और बेचारा किसान मन मसोस के रह जाता/

एक दिन, बहुत दुखी मन से, वह ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाया/ विनती की कि उसे अगले वर्ष ख़ूब लहलहाती फसल दे/ मेहनत करते करते वह उकता चुका था / शारीरिक श्रम की शक्ति भी अब पहले जैसी नहीं थी/ ईश्वर ने उसको लहलहाती फ़सल का वरदान दे दिया/

किसान आश्वस्त हो गया और उसने सोचा कि अब कुछ आराम से जीवन  बिता लूं / पहले जैसे मेहनत की क्या ज़रूरत है/ ईश्वर ने वादा किया है तो निभाएगा ही/

उचित समय आने पर फसल तैय्यार हो चुकी थी/ लहलहाती फसल देख का किसान मन ही मन बहुत खुश था कि अब तो ज़मींदार का क़र्ज़ भी उतार लेगा और उसके बाद अपनी गृहस्थी के लिए भी कुछ अनाज बच जायेगा; आराम से गुज़र -बसर हो जाएगी/

परन्तु, जैसे ही उसने फसल काटनी शुरू की, उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा/ वह सदमे में आ गया/ गेहूं की लहलहाती बालियों में तो कुछ और ही राज़ छुपा था/ जैसे ही छटनी शुरू की, किसान यह देख कर सकते में आ गया कि गेहूँ की बालियाँ अंदर से खोखली थी/ उनमें गेहूँ का एक भी दाना न था/


कृपया शेष कहानी के लिए देखिये आप न मरिये, स्वर्ग न जाईये :भाग 2 

नोट:  मित्रों ,मैंने हाल ही में, जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित लघु-कथाएं कलमबद्ध करने का प्रयास किया है/ इन में से कुछ जगबीती हैं और कुछ आपबीती/ कुछ और लघु-कथाएं भी आपके साथ धीरे धीरे सांझा करूंगी/ आपकी प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी और सुधार के लिए दिशा भी/ ब्लॉग के कमेंट-बॉक्स में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/

रजनी छाबड़ा