Thursday, May 7, 2026

किसे परवाह रहती है

 किसे परवाह रहती है, आँधियों की 

इक बड़े तूफ़ान के बाद 

हर ग़म छोटा हो जाता हे 

इक उस से बड़े ग़म  के बाद 


क़ुबूल  है हर वो सितम 

जो भी मिले तेरे आशियाने से

अब तो तू सितम भी करे 

वो करम होगा 

यूं तो सितम बहुत सहे हैं 

इस ज़माने के 


बीज ज़मीन में दफ़न हो के भी, फ़ना नहीं होता 

पनपता है दोबारा, गुल ए गुलज़ार में 

मिलना और बिछड़ना , दस्तूर है फख्त ज़िंदगी का 

फिर मिलेंगे हम मौसम ऐ बहार में 


रजनी छाबड़ा 


Wednesday, May 6, 2026

सुकून के लिए fav

सुकून के लिए 

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निगाहों को झुकाये रखने की आदत डालिये 

जाने कब कौन क्या कयास लगा डाले 


जुबां को खामोश रहने की आदत सी हो गयी 

दुनिया ने इतने बेगैरत सवाल उछाले 


अब तो फूँक फूँक कर कदम उठाने पड़ते है 

दुनिया ने राह में इतने शूल बिछा डाले 


 भूल जाना बेहतर हैं उन्हें 

जिन्होंने आपकी राहों में पत्थर उछाले 


सुकून के लिए याद रखिये उन्हें 

जिन्होंने सहलाये आप के पावों के छाले 


रजनी छाबड़ा 

Monday, May 4, 2026

अतीत के गलियारे

 आज अतीत के गलियारे में झांकता हूँ, तो ज़िन्दगी कितनी बेमानी नज़र आती है/ बचपन के यादें धुंधला चुकी है/ अल्हड़ यौवन की यादें भी दुःख ही दे रही हैं/ शादी के बाद भी  पूर्णता का एह्सास न पा सका/ प्रेम-विरह, बस इनकी यादों के वितान तले ही तो जी रहा हूँ मैं/

दुनियावी नज़र से देखा जाये तो मैं  एक कामयाब, दौलतमंद इंसान हूँ/ ऐशो आराम की ज़िंदगी बसर करता हूँ/ दौलत के दम पर जो चाहे हासिल कर सकता हूँ/ पर क्या खुश हूँ मैं? सपनों के पंखों पर सवार हो कर, नील गगन में उन्मुक्त उड़ान भरना, हवाओं के साथ अठखेलियां करना और बहारों का लुत्फ़ लेना,अब तो यादों की और ख्वाबों की बात हो गया है/

बचपन का खुशनुमा सफर पार करने  बाद, जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही, जीने का अंदाज़ बदलने लगता है/ महसूस होता है, जहान की सारी सौगातें हमारे लिए ही तो है ; हाथ फैलाएं और अपनी झोली में समेट लें/ बहारों से बटोर लें ,रंग सारे और आँचल में समेत लें चाँद तारे/

TO BE CONTINUED

  बात सिर्फ इतनी सी 

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बगिया की
शुष्क घास पर
तनहा बैठी वह
और सामने
आँखों में तैरते
फूलों से नाज़ुक
किल्कारते बच्चे

बगिया का वीरान कोना
अजनबी का
वहाँ से गुजरना
आंखों का चार होना

संस्कारों की जकड़न 
पहराबंद
उनमुक्त धड़कन
अचकचाए
शब्द
झुकी पलकें
जुबान खामोश
रह गया कुछ
अनसुना,अनकहा

लम्हा वो बीत गया
जीवन यूँ ही रीत गया

जान के भी
अनजान बन
कुछ
बिछुडे ऐसा
न मिल पाये
कभी फिर
जंगल की
दो शाखों सा

आहत मन की बात
सिर्फ इतनी
तुमने पहले क्यों
न कहा

वह  आदिकाल
से अकेली
वो अनंत काल
से उदास
और सामने
फूलों से नाज़ुक बच्चे
खेलते रहे/

Friday, May 1, 2026

युगों युगों तक


युगों युगों तक 

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 ज़िंदगी की किसी अनजानी राहगुज़र पर 

मिल जाये जब यकायक मनचाहा हमसफर 

कहता हैं मन, कभी थमे न यह सफर 

एक एक पल , बन जाये एक युग का 

और सफर चलता रहा युग-युगान्तर /


(पुरानी डायरी के पन्नों से)

रजनी छाबड़ा  

प्यार इक तरफ़ा नहीं है


 सुर सजते हैं जब 

मन के तार बजते हैं 


लहरें अठखेलियाँ करती 

सागर के साथ  

सागर को भी देती विस्तार 

प्यार इक तरफ़ा नहीं है 


पावस की बूँद की आस 

चातक सहेजे रखता प्यास 

चाहे कितनी भी हो दुश्वारियां 

ऐसी ही सच्चे आशिकों की यारियां/


रजनी छाबड़ा 

बहुभाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 


Thursday, April 30, 2026

दुनिया का दस्तूर यही है

 दुनिया का दस्तूर यही है 

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या, ख़ुदा !

दीन दुनिया के  

रस्मों रिवाज़ 

क्यों प्यार करने वालो से 

रहते नाराज़ 


खुशनसीब हैं परिंदे 

जिन्हें नहीं कोई बंदिशे 

जब चाहा पंख पसारे 

भर ली उन्मुक्त उड़ान 

कोई उनसे नहीं पूछता सवाल 

किसे के साथ विचर रहे थे तुम दिन भर 

किस पेड़ पर बिताई तुमने सारी रात 


इंसानो  की तो ज़िन्दगी ही रीत जाती है 

दुनियावी दस्तूरों की बेड़ियाँ के बंधन में 

दस्तूर हावी हो जाते हैं उन्मुक्त जीवन पर 


रजनी छाबड़ा