Wednesday, June 10, 2015

 सपने हसीन  क्यों होते हैं
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स्नेह,दुलार,प्रीत 
मिलन,समर्पण
आस, विश्वास  के 
सतरंगी 
ताने बाने से बुने
सपने इस कदर   
हसीन  क्यों होते हैं

कभी मिल जाते हैं 
नींद को पंख
कभी आ जाती है
पंखों को नींद
हम सोते मैं जागते
और जागते मैं सोते हैं
सपने इस  कदर  
हसीन क्यों होते हैं

बे नूर आँखों मैं 
नूर जगाते
उदास लबों पर 
मुस्कान खिलाते
मायूस सी ज़िंदगी को
ज़िंदगी का साज सुनाते
सपने इस कदर
 हसीन क्यों होते है

कल्पना के पंख पसारे
जी लेते हैं कुछ पल
इनके सहारे
अँधेरे के आखिरी छोर पर
कौंधती बिजली से यह सपने
इस कदर हसीन 
क्यों होते हैं

जिस पल मेरे सपनों पर
लग जायेगा पूर्ण विराम
मेरी ज़िंदगी के चरखे को भी
मिल जायेगा अनंत  विश्राम

Sunday, June 7, 2015

क्या जानें

क्या जानें

बिखरे हैं आसमान मैं
ऊन सरीखे ,
बादलों के गोले

क्या जाने,आज ख़ुदा
किस उधेढ़ बुन में है/

रजनी छाबड़ा 

Friday, June 5, 2015

कहाँ गए

कहाँ गए

कहाँ गए सुनहरे  दिन
जब बटोही सुस्ताया करते थे
पेड़ों की शीतल छाँव  मैं

कोयल कूकती थी
अमराइयों मैं
सुकून था गावँ में


कहाँ गए संजीवनी दिन
जब नदियां स्वच्छ शीतल
जलदायिनी थी

शुद्ध हवा मैं सांस लेते थे हम
हवा ऊर्जा वाहिनी थी

रजनी छाबड़ा

Tuesday, June 2, 2015

हम जिंदगी से क्या चाहते हैं
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हम खुद नहीं जानते
हम जिंदगी से क्या चाहते हैं
कुछ कर गुजरने की चाहत मन में लिए
अधूरी चाहतों में जिए जाते हैं

उभरती हैं जब मन में
लीक से हटकर ,कुछ कर गुजरने की चाह
संस्कारों की लोरी दे कर
उस चाहत को सुलाए जाते हैं

सुनहली धूप  से भरा आसमान सामने हैं
मन के बंद अँधेरे कमरे में सिमटे जाते हैं

चाहते हैं ज़िन्दगी में सागर सा विस्तार
हकीकत में कूप दादुर सा जिए जाते हैं

चाहते हैं ज़िन्दगी में दरिया सी रवानी
और अश्क आँखों में जज़्ब किये जाते हैं

चाहते हैं जीत लें ज़िन्दगी की दौड़ 
और बैसाखियों के सहारे चले जाते हैं

कुछ कर गुजरने की चाहत
कुछ न कर पाने की कसक
अजीब कशमकश में
ज़िंदगी जिए जाते हैं

हम खुद नहीं जानते
हम ज़िन्दगी से क्या चाहते हैं


रजनी छाबड़ा