Sunday, April 22, 2018

कहाँ गए सुनहरे दिन

कहाँ गए सुनहरे  दिन 
जब बटोही सुस्ताया करते थे 
पेड़ों की शीतल छाँव में 

कोयल कूकती थी 
अमराइयों में  
सुकून था गावँ में 

कहाँ गए संजीवनी दिन 
जब नदियां स्वच्छ शीतल 
जलदायिनी थी 

शुद्ध हवा में  सांस लेते थे हम 
हवा ऊर्जा वाहिनी थी 

रजनी छाबड़ा 

Thursday, April 19, 2018

अनुसृजन: साहित्यिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान


अनुसृजन: साहित्यिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान 

साहित्य सृजन मन के भावों को उकेरने का माध्यम है और अनुवाद इन भावात्मक छवियों को अपनी भाषा के शब्द शिल्प में बांधकर और विस्तार देने का सशक्त साधन/
लेखन में भावाभिव्यक्ति जब दिल की गहराईयों से उतरती हैभाषा और प्रदेश के बंधन तोड़ती हुई, सुधि पाठकगण के मन में गहनता से स्थान बना लेती है/ यहाँ मैं यह बात अपने हिंदी काव्य संग्रह पिघलते हिमखंड के सन्दर्भ में भी कह रही हूँ/ इस काव्य कृति की चुनिन्दा कविताओं के नेपाली, बंगाली, पंजाबी, राजस्थानी, मराठी, गुजराती में अनुवाद की श्रृखला में एक विशिष्ट कड़ी जुड गयी है; सम्पूर्ण काव्य संग्रह का मैथिली अनुवाद और यह सराहनीय अनुसृजन डॉ.शिव कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर हिंदी, पटना विश्व विद्यालय के अथक प्रयासों का परिणाम है/
व्यक्तिगत रूप से डॉ शिव कुमार से कोई परिचय नहीं था/ फेसबुक की आभासी दुनिया के माध्यम से जान पहचान हुई/ मैंने आज तक अपने प्रथम हिंदी काव्य संग्रह होने से न होने तक के अलावा अपनी अन्य मौलिक और अनुसृजित काव्य कृतियों का कभी भी औपचारिक लोकार्पण नहीं करवाया/ सोशल मीडिया पर ही पाठक गण को अपनी कृतियाँ लोकार्पित किया करती हूँ/ बहुत से साहित्यिक प्रवृति के मित्रों व् प्रकाशकों से परिचय हुआ फेसबुक के माध्यम से/ डॉ.शिव ने भी मेरी कुछ रचनाएँ फेसबुक पर देखी, जिन में से पिघलते हिमखंड की रचनाएँ उन्हें काफी पसंद आयी और उन्होंने इस काव्य संग्रह की मैथिली में अनुवाद करने की इच्छा जतायी, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकारा/ यह उनकी निष्ठा और कार्य के प्रति समर्पण का ही फल है की इतने अल्प समय में इतना प्रभावी अनुसृजन हो पाया है/ मूल रचनाकार के मनोभावों को आत्मसात करना और उस में अपनी भाषा में अभिव्यक्त करते हुए शोभा में वृद्धि करना कोई आसान काम नहीं है; परन्तु डॉ शिवकुमार से इस अनुवाद कार्य को  बहुत सहजता से सम्पन्न किया/
यदि आप इन कविताओं को मैथिली में पढेंगे तो ऐसा आभास होगा जैसे कि यह मूलतः मैथिली में ही लिखी गयी हों/ यह अनुसृजनकर्ता की अत्यन्त प्रशंसनीय उपलब्धि है/ कुछ चुनिन्दा रचनाओं का आनन्द आप भी लीजिये, मूल हिंदी और अनुदित मैथिली रचना
मधुबन
कतरा
कतरा
नेह के
अमृत से
बनता पूर्ण
जीवन कलश

यादों की
बयार से
नेह की
फुहार से
बनता जीवन
मधुबन


मधुबन
बुन्न बुन्न
नेहक अमिय सँ
जिनगीक घैल
भरैत छै।
स्मृतिक
बसात आ
नेहक फुहार सँ
बनैत छै
जिनगीक मधुबन।



यह कैसा सिलसिला
कभी कभी दो कतरे नेह के
दे जाते हैं सागर सा एहसास

कभी कभी सागर भी
प्यास बुझा नहीं पाता

जाने प्यास का यह कैसा है
सिलसिला और नाता/

'"ई केहन अनुक्रमण"
कखनहुँ तऽ नेहक दू बुन्न 
दऽ जाएत छै सिन्धु सन तोष
कखनहुँ समुद्रो
पियास नहि मेटा पबैत छै
नै जानि पियासक ई केहन
अनुक्रमण आ नाता छै !



क्या जानें
बिखरे हैं आसमान में
ऊन सरीखे
बादलों के गोले
क्या जाने, आज ख़ुदा
किस उधेड़ बुन में हैं/

की जैन
छितराएल छै अकाश मे
ऊँन सन
मेघक ढेपा
की जैन आइ परमतमो
कोन गुण धुन मे लागल छैथ !


मैथिली अनुवाद सुधि पाठकों को सौंपते हुए, प्रभु से कामना करती हूँ कि डॉ शिव कुमार की अनुदित कृति साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान बना पायें/ हृदय से आभरी हूँ अनुसृजनकर्ता की जिनके माध्यम से मेरे हिंदी काव्य संग्रह पिघलते हिमखंड को साहित्यिक रूप से समृद्धभाषा मैथिली में विस्तार मिल रहा हैं/ इस काव्य गुच्छ की सुरभि कहाँ कहाँ पहुँची, जानने की उत्सुकता और आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी/
  
रजनी छाबड़ा
बहुभाषीय कवियत्री व् अनुवादिका
गुरुग्राम (हरयाणा)





Tuesday, March 6, 2018

मैं कहाँ थी



मैं कहाँ थी 

मैं जब वहां थी
तब भी, मैं
नहीं वहां थी
अपनों की
दुनिया के मेले में ,
खो गयी मैं
न जाने कहा थी

बड़ों की खूबियों
का अनुकरण
कर  रहा  था
मेरे व्यक्तित्व 
का हरण 
मेरा निज 
परत  दर परत
दफ़न हो रहा था
और मैं अपने
दबते अस्तित्व से
परेशान थी

कच्ची उम्र में 
ज़रूरत होती है
सहारे की 
अपने पैरों
खड़े होने के बाद,
सहारे सहारे चलना
नादानी है बेल की
सोनजुही सी
पनपने की
सामर्थय मेरी
औरों के
सहारे सहारे चलना
क्यों मान लिया था
नियति  मेरी

मौन व्यथा और 
आंसुओं  से
सहिष्णु धरती का
सीना सींच
बरसों बाद 
अंकुरित हुई हूँ अब
संजोये मन में , 
पनपने की चाह
बोनसाई सा नही 
चाहती हूँ ज़िंदगी में 
सागर सा विस्तार

नही जीना चाहती
पतंग की जिंदगी
लिए आकाश का विस्तार
जुड़ कर सच के धरातल से
अपनी ज़िंदगी का ख़ुद
बनना चाहती हूँ आधार



रजनी छाबड़ा 











Monday, December 18, 2017

जीने की वजह

निज ज़िन्दगी में
 न जागने की वजह
न सोने की वजह

इसे दुनिया के नाम
कर दीजिए
जीने की वजह 
खुद बख़ुद
मिल जायेगी

अश्क पीने की आदत
बदल जाएगी
अश्क़ पोंछने का हुनर
रास आ जाएगा
जीने का अन्दाज़
निखर जाएगा/

Wednesday, November 22, 2017

क्षितिज के पास

क्षितिज के पास 

क्षितिज के पास 
कर रहे हो 
इन्तज़ार मेरा 


जहाँ दो जहान 
मिल कर भी 
नहीं मिलते 
अधूरी है तम्मनाएँ 
अधूरी मिलन की आरज़ू 
फ़ूल अब खिलकर भी 
नहीं खिलते/

Tuesday, September 26, 2017


मकड़ी सम


ज़िन्दगी की आपाधापी में
इंसान कदर व्यस्त हो गया है
उसका खुद का वक़्त
कहीं खो गया है


रोज़मर्रा की
जोड़ तोड़ में उलझ गया है
ज़िंदगी का गणित
ज़िन्दगी में अब पहले सी
लज़्ज़त  नहीं


दिन भर की उलझनों के बीच
सिर्फ एक वक़्त ही
उसका अपना है
ऑफिस से घर तक का सफ़र
जब वह खुले छोड़ देती है
दिमाग़ के ख्याली घोड़े
सोचती है कुछ फुर्सत मिलें
बिताएंगी मनपसंद ढंग से
कुछ दिन थोड़े
पर फुर्सत के लम्हे
मिलते ही नहीं


शिक़ायत करे भी
तो किस से
वो बेचारी
अपने इर्द  गिर्द
व्यस्तता के ताने बाने बुनती
खुद अपने ही जाल में
मकड़ी सम उलझी नारी/