Wednesday, September 29, 2010

RAM YA REHMAAN

वह बोझिल मन लिए
उदास उदास
निहार रहा अपनी कुदरत
खड़ा क्षितिज के पास
मिल कर भी
नहीं मिलते जहाँ
दो जहां

अपनी अपनी आस्था की धरा पे
कायम हैं उसके बनाये इंसान
हो गए हैं जिनके मन प्रेम विहीन
बिसरा दिए हैं जिन्होंने दुनिया और दीं

इस रक्त रंजित धरा पर बिखरे
खून के निशाँ
वही नही बता सकता
उन्हें में कौन है
राम और कौन रहमान

बिसूरती मानवता के यह अवशेष
लुटती अस्मत,मलिन चेहरे,बिखरे केश

सुर्ख उनीदीं आँखें
जिन्हें सोने नहीं देता यह खौफ
जाने कौन घड़ी जला दिया जाये
उनका आशियाना
जब सारा समाज ही
 हो रहा वहिशयाना

जहां सजता था
खुशियों का आशियाना
वहां बसर कर रहे
ख़ामोशी और वीराना

कुदरत बनाने वाला
शर्मिंदा है खुद
देख कर अपने
बन्दों के कर्म
और चाहता है सिर्फ
इंसानियत का धर्म
प्रेम,संवेदना और सहिष्न्नुता का मर्म
वरना न तो कुदरत रहेगी
न इंसान,न धर्म.

aur

Thursday, August 26, 2010

NIRJHAR

निर्झर
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पर्वत के शिखर की
उतुन्गता से उपजे
शुभ्र,धवल
निर्झर से तुम
कटीली उलझी राहों
अवरोधों को अनदेखा कर
कल कल करते
गुनगुनाते
सम गति से चलते
अपनी राह बनाते जाना
गतिशीलता धर्म तुम्हारा
रुकने झुकना
नहीं कर्म तुम्हारा
प्रशस्त राहों के राही
बनना है तुम्हे
अंधियारे मैं
दीप सा
जलते रहना
रजनी छाबरा

Thursday, July 1, 2010

EK DUA

एक दुआ
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वह उम्र के उस रुपहले दौर से
गुज़र रही है
जब दिन सोने के और
रातें चांदी सी
नज़र आती हैं
जब जी चाहता है
आँचल में समेट ले तारे
बहारों से बटोर ले रंग सारे
जब आईने में खुद को निहार
आता है गालों पर
सिंदूरी गुलाब सा निखार
और खुद पर ही गरूर हो जाता है
जब सतरंगी सपनों की दुनिया मे खोये
इंसान खुद से ही बेखबर नज़र आता है
जब तितली सी शोख उड़ान लिए
बगिया में इतराने को जी चाहता है
जब पतंग सी पुलकित उमंग लिए
आकाश नापने को जी चाहता है
जब मन की छोटी से छोटी बात
बताई जाती है सहेली को
जब महसूस होता है,सुलझा सकते हैं
जीवन की हर पहेली को

पर वह मासूम नहीं जानती
कितनी नादान है वह
डोर किसी हाथ में थामे बिना पतंग उड़  नहीं सकती
तितले भी बगिया में बेखौफ घूम नहीं सकती
धूमिल हो जाती है सतरंगी इन्द्रधनुषी छवि भी
सिर्फ पैदा करते हैं खुद के जज़्बात
सुनहले दिन और रुपहले तारों भरी रात

या खुदा!उसकी मासूमियत यूं हो बनाये रखना
ज़िन्दगी में आशा के दीप जलाये रखना
सतरंगी सपनों का संसार न बिखरे कभी
उसके जीवन में बहारों के रंग सजाये रखना

Tuesday, June 22, 2010

aasthaa ke but

आस्था के बुत
------------
हर शहर की
हर गली मैं
कुछ बुतखाने और
कुछ इबादतखाने होते हैं
जहां लोग
अपनी अपनी
आस्था के बुत
बना देते हैं
अपने अपने
रस्म-ओ-रिवाजों से
उनको सजा लेते हैं
बाकी दुनिया के
धर्म कर्म से फिर
वो बेमाने होते हैं
धीरे धीरे
इस कदर
खो जाते हैं
सतही इबादत में ,कि
अपने धर्म कों
अपने ईमान से
सींचने कि बजाय
रंग देते हैं
उनके खून से
जो उनके मजहब से
बेगाने होते हैं
आस्था के बुत
बनाते बनाते
उन्हें मालूम ही नहीं चलता
कि वोह खुद कब
बुत बन जाते हैं

Sunday, June 20, 2010

घर

घर

प्यार औ अपनत्व
जहाँ  दीवारों की
छत बन जाता है
वो मकान
घर कहलाता है

रजनी छाबड़ा 

Monday, May 31, 2010

Baal Shramik

बाल श्रमिक
=========
वह जा रहा है बाल श्रमिक
अधनंगे बदन पर लू के थपेड़े सहते
तपती,सुलगती दुपहरी में ,सर पर उठाये
ईंटों से भरी तगारी
सिर्फ तगारी का बोझ नहीं
मृत आकांक्षाओं की अर्थी
सर पर उठाये
नन्हे श्रमिक के बोझिल कदम डगमगाए
तन मन की व्यथा किसे सुनाये
याद आ रहा है उसे
मां जब मजदूरी पर जाती और रखती
अपने सर पर ईंटों से भरी तगारी
साथ ही रख देती दो ईंटें उसके सर पर भी
जिन हालात मैं खुद जे रही थी
ढाल दिया उसी मैं बालक को भी
माँ के पथ का बालक
नित करता अनुकरण
लीक पर चलते चलते,
खो गया कहीं मासूम बचपन
शिक्षा  की डगर पे चलने का अवसर
मिला ही नहीं कभी
उसे तो विरासत मैं मिली
अशिक्षा की यही कटीली राह

काश! वह रोज़ी रोटी की फिक्र के
दायरे से निकल पाए
थोडा वक़्त खुद के लिए बचाए
जिसमे पढ लिख कर
संवार ले वह  बाकी की उम्र
बचपन के मरने का जी दुःख उसने झेला
आने वाले वक़्त में,वह कहानी
उसकी संतान न दोहराए
पढने  की उम्र में ,श्रमिक न बने
कंधे पर बस्ता उठाये
शान से पाठशाला जाए


Friday, May 28, 2010

ज़रा सोच लो

ज़रा सोच लो
------------
दूसरों को ठोकरें मारने वालो
ज़रा सोच लो एक पल को
पराये दर्द का एहसास
तुम्हे भी सालेगा तब
ज़ख़्मी हो जायेंगे
तुम्हारे ही पाँव जब
दूसरों को ठोकरें मारते मारते



रजनी छाबड़ा 

Saturday, May 15, 2010

mn ki patang

मन की पतंग


पतंग सा शोख मन
लिए चंचलता अपार
छूना चाहता है
पूरे नभ का विस्तार
पर्वत,सागर,अट्टालिकाएं
अनदेखी कर
सब बाधाएं
पग आगे ही आगे बढाएं

ज़िंदगी की थकान को
दूर करने के चाहिए
मन की पतंग
और सपनो का आस्मां
जिसमे मन भर  सके
बेहिचक,सतरंगी उड़ान

पर क्यों थमाएं डोर
पराये हाथों मैं
हर पल खौफ
रहे मन मैं
जाने कब कट जाएँ
कब लुट जाएँ

चंचलता,चपलता
लिए देखे मन
ज़िन्दगी के आईने
पर सच के धरातल
पर टिके कदम ही
देते ज़िंदगी को मायने


रजनी छाबड़ा 

Sunday, March 21, 2010

maa

ज़िन्दगी और

मौत के बीच

zindagi से lachaar

से पड़ी थी तुम

मन ही मन तब चाहा था मैंने

की आज तक तुम मेरी माँ थी

आज मेरी बेटी बन जाओ

अपने आँचल की छाओं मैं

लेकर करूं तुम्हारा दुलार

अनगिनत

mannaten

खुदा से कर

मांगी थी तुम्हारी जान की खैर




बरसों तुमने मुझे

पाला पोसा और संवारा

सुख सुविधा ने

जब कभी भी किया

मुझ से किनारा

रातों के नींद

दिन का चैन

सभी कुछ मुझ पे वारा

मेरी आँखों मैं गेर कभी

दो आँसू भी उभरे

अपने स्नेहिल आँचल मैं

sokhलिए तुमने

एक अंकुर थी मैं

स्नेह, ममता

से सींच कर मुझे

छाया भेरा तरु

banayaa

ज़िंदगी

भेर मेरा मनोबल

बढाया

हर विषम परिस्थिति मैं

मुझ को समझाया

वो बेल कभी न होना तुम

जो परवान चढ़े

दूसरों के सहारे

अपना सहारा ख़ुद बनना

है तुम्हे,ताकि परवान चढा

सको उन्हें जो हैं तुम्हारे सहारे




पैर तुम्हे सहारा देने की तमन्ना

दिल मैं ही रह गयी

तुम ,हाँ, तुम जिसने सारा जीवन

सार्थकता से बिताया था

कभी किसी

के आगे

सेर न झुकाया था

जिस शान से जी थी

उसी शान से दुनिया छोड़ चली

हाँ, मैं ही भूल गयीथी

उन्हें बैसाखियों के सहारे चलना

कभी नही होता गवारा

जो हर हाल मैं

देते रहे हो सहारा















ज़िन्दगी और

मौत के बीच

zindagi से lachaar

से पड़ी थी तुम

मन ही मन तब चाहा था मैंने

की आज तक तुम मेरी माँ थी

आज मेरी बेटी बन जाओ

अपने आँचल की छाओं मैं

लेकर करूं तुम्हारा दुलार

अनगिनत

mannaten

खुदा से कर

मांगी थी तुम्हारी जान की खैर




बरसों तुमने मुझे

पाला पोसा और संवारा

सुख सुविधा ने

जब कभी भी किया

मुझ से किनारा

रातों के नींद

दिन का चैन

सभी कुछ मुझ पे वारा

मेरी आँखों मैं गेर कभी

दो आँसू भी उभरे

अपने स्नेहिल आँचल मैं

sokhलिए तुमने

एक अंकुर थी मैं

स्नेह, ममता

से सींच कर मुझे

छाया भेरा तरु

banayaa

ज़िंदगी

भेर मेरा मनोबल

बढाया

हर विषम परिस्थिति मैं

मुझ को समझाया

वो बेल कभी न होना तुम

जो परवान चढ़े

दूसरों के सहारे

अपना सहारा ख़ुद बनना

है तुम्हे,ताकि परवान चढा

सको उन्हें जो हैं तुम्हारे सहारे




पैर तुम्हे सहारा देने की तमन्ना

दिल मैं ही रह गयी

तुम ,हाँ, तुम जिसने सारा जीवन

सार्थकता से बिताया था

कभी किसी

के आगे

सेर न झुकाया था

जिस शान से जी थी

उसी शान से दुनिया छोड़ चली

हाँ, मैं ही भूल गयीथी

उन्हें बैसाखियों के सहारे चलना

कभी नही होता गवारा

जो हर हाल मैं

देते रहे हो सहारा

Sunday, March 7, 2010

hum zindagi se kya chahte hain

हम जिंदगी से क्या चाहते हैं
-----------------------
हम खुद नहीं जानते
हम जिंदगी से क्या चाहते हैं
कुछ कर गुजरने की चाहत मन में लिए
अधूरी चाहतों में जिए जाते हैं

उभरती हैं जब मन में
लीक से हटकर ,कुछ कर गुजरने की चाह
संस्कारों की लोरी दे कर
उस चाहत को सुलाए जाते हैं

सुनहली धुप से भरा आसमान सामने हैं
मन के बंद अँधेरे कमरे में सिमटे जाते हैं

चाहते हैं ज़िन्दगी में सागर सा विस्तार
हकीकत में कूप दादुर सा जिए जाते हैं

चाहते हैं ज़िन्दगी में दरिया सी रवानी
और अश्क आँखों में जज़्ब किये जाते हैं

चाहते हैं जीत लें ज़िन्दगी की दौड़
और बैसाखियों के सहारे चले जाते हैं

कुछ कर गुजरने की चाहत
कुछ न कर पाने की कसक
अजीब कशमकश में
ज़िंदगी जिए जाते हैं

हम खुद नहीं जानते
हम ज़िन्दगी से क्या चाहते हैं

Friday, March 5, 2010

zindagi ki kitaab se { Dedicated To Cancer Patients}

ज़िन्दगी की किताब से
-------------------
ज़िन्दगी की किताब से
फट जाता है जब
कोई अहम पन्ना
अधूरी रह जाती है
जीने की तमन्ना

कभ कभी बागबान से
हो जाती है नादानी
तोड़ देता है ऐसे फूल को
जिसके टूटने से
सिर्फ शाख ही नहीं
छा जाती है
सारे चमन में वीरानी
रह जाता है मुरझाया पौधा
सीने में छुपाये
दर्द की कहानी

जिस पौध को पानी की बजाए
सींचना पड़ता हो
अश्कों ओर नए खून से
उस दर्द के पौधे का
अंजाम क्या होगा

अंजाम की फ़िक्र में
प्रयास तो नहीं छोड़ा जाता
मौत के बड़ते कदमों की
आहट से डर
जीने की राह से मुहँ
मोड़ा नहीं जाता
जब तक सांस
तब तक आस

गिने चुने पलों को
जी भर जीने का मोह
पल पल में
सदियाँ जी लेने की चाह
ज़िन्दगी में भर देता
इतनी महक सब ओर
विश्वास ही नहीं होता
कैसे टूट जाएगी यह डोर

दर्द के पौधे पर
अपनेपन के फूल खिलते हैं
यह फूल रहें या न रहें
इनकी यादों की खुशबू से
चमन महकते हैं
------------------
कैंसर रोगी को समर्पित कविता
रजनी छाबड़ा 

Sunday, February 28, 2010

is andaaz se holi manayen

आइए ,इस अंदाज़ से होली मनाये
-------------------------------
आइए,इस अंदाज़ से होली मनाये
होली जलाएं दुर्गुणों की,
साम्प्रदायिकता की
संकीर्ण मानसिकता की

गत वर्षों में
बहुत उड़ायें हैं
मानवता के खून के छींटे
इस वर्ष,मिटे कर सब मलाल
लगायें सभी को
आत्मीयता से गुलाल
मिटा कर जात पात
अपने पराये का ख्याल
लगायें सभी को आत्मीयता से गुलाल
खुशियों के रंग में रंगे जीवन
सभी रहे सदा खुशहाल
रजनी छाबरा.

Saturday, February 27, 2010

indradhanush

मेरी
ज़िन्दगी के आकाश पे
 इन्द्रधनुष   सा
उभरे तुम

नील गगन सा विस्तृत
तुम्हारा प्रेम
तन मन को पुलकित
हरा  भरा  कर देता

खरे सोने सा सच्चा
तुम्हारा प्रेम
जीवन
रंग देता

तुम्हारे
स्नेह की
पीली ,सुनहली
धूप   मैं

नारंगी सपनों का
ताना बाना बुनते
संग तुम्हारे पाया
जीवन मैं
प्रेम की लालिमा
 सा विस्तार
 इंद्रधनुषी
सपनो से
सजा
संवरा
अपना संसार

बाद
तुम्हारे
इन्द्रधनुष  के और
रंग खो गए
बस, बैंजनी विषाद
की छाया
दूनी है
बिन तेरे ,
मेरी ज़िन्दगी
सूनी सूनी
है

रजनी छाबड़ा

Thursday, February 25, 2010

सुकून में कहाँ वो मज़ा

सुकून में कहाँ वो मज़ा


सुकून में कहाँ वो मज़ा
जो देती है बेताबी
जूनून देता है बेताबी
हर पल पाने को कामयाबी
सुकून है मंजिल
रास्ता है बेताबी

रजनी छाबड़ा 

Wednesday, February 24, 2010

apni pehchaan

अपनी पहचान
==========

खुद से रु ब रु होने के बाद भी
हम अपनी पहचान के लिए
आईने  क्यों तलाशते हैं
आईने झलक दिखा देते हैं
जिस्मानी अक्स की
रुहानी अक्स की पहचान
हम इन में कहाँ पाते हैं

Saturday, February 20, 2010

agni ke antim rath per

अग्नि के अंतिम रथ पर विदा हुए जब तुम
तुम अकेले न थे उस में
संग थे मेरे अरमान,मेरे सपने

तुम ज़िन्दगी की सरहद के उस पार
सांझ के तारे में
करती हूँ तुम्हारा दीदार

तेरी यादों की अरणियों से
सुलगती  अब भी
दफ़न हुई राख़ में चिंगारियां
तिल तिल सुलगाती मुझे
ज़िन्दगी के तनहा सफ़र में

Thursday, February 4, 2010

zindagi ne to mujhe kabhi fursatt na di

ज़िन्दगी ने तो मुझे कभी फुर्सत न दी


====================

ज़िन्दगी ने तो मुझे कभी फुर्सत न दी

ऐ,मौत,तू ही कुछ मोहलत दे

अत्ता करने हैं अभी

कुछ क़र्ज़ ज़िन्दगी के

अदा करने हैं अभी

कुछ फ़र्ज़ ज़िन्दगी के

पेशतर इसके,हो जाऊं

इस ज़हान से रुक्सत

चंद फ़र्ज़ अदा करने की,

ऐ मौत, तू ही कुछ मोहलत दे





अधूरी है तमन्ना अभी

मंजिलों को पाने की

पेशतर इसके

खो जाऊं,

गुमनाम अंधेरों में

चंद चिराग रोशन करने


ए मौत,तू ही कुछ मोहलत दे

रजनी छाबरा

Friday, January 29, 2010

kyon

क्यों सुलगता रहता है

हर पल,मन मेरा

आसूं भी

इस आग को

पानी देने में

नाकाम है

क्या मृगतृष्णा सी

चाहतों का

यहीं अंजाम है


रजनी छाबड़ा

Wednesday, January 27, 2010

yaadon ke jhrokhe se

यादों के झरोखे से
============

तेरी यादों के झरोखे से

जब धुप छनी किरणें

आती हैं

दो पल को ही सही

अँधेरे में उजाले का भ्रम

जगा जाती हैं

Monday, January 18, 2010

basant

बसंत


वक़्त ने

जिन घावों पर

थी मरहम लगाई

मौसम ने उन्ही को

हरा करने की

रस्म दोहराई

मेरी पीड़ा का

न आदि है

न अंत

मुरझाये हुए

जख्मों का

फिर से हरा होना

बस यही है

मेरा बसंत


Sunday, January 17, 2010

पक्षपात

पक्षपात
======

दोष लगेगा उस पर

 पक्षपात का

गर ज़रा सा भी दुःख

न वह  देगा मुझे

मैं भी तो एक ज़र्रा हूँ

उसकी कायनात का

उसी कारवां की एक मुसाफिर

सुख दुःख की छावों मैं

चलते हैं जहां सभी

अछूती रही गर

दुनिया के दस्तूर से

क्या रूस्वाँ न होगा

मेरा मुक्कदर

लिखने वाला



रजनी छाबड़ा 

Friday, January 15, 2010

kaash!

काश!


काश!अपना कह देने भर से ही

गैर अपने होते

तो अनजान शहर में भी

अजनबी लोगों से घिरे

खुशनमा सपने होते

मगर हकीकत तो यह की

अपने ही शहर में अपने

बेगानों सा मिला करते हैं

क्यों खफा रहते हैं आप हम से

इस पर यह गिला करते हैं



रजनी छाबरा

Thursday, January 14, 2010

मैं मनमौजी

मैं मनमौजी
========

मुझ से कैसी होड़ पतंग की

मैं पंछी खुले आसमान का

सकल विस्तार

 निज पंखों से नापा

डोर पतंग की

 पराये हाथों

उड़ान गगन की

आधार धरा का

Thursday, January 7, 2010

yaaden

यादें


यादें पहले प्यार की

जीते जी भुलाना

गर इस कद्र आसान होता

तो,हर शाम की तन्हाई मैं

इक नया प्यार जवान होता