Tuesday, November 22, 2016

याद आता है बरबस

याद आता है बरबस
वो रूठना, मनाना
वो तकरार

कितना प्यारा
अंदाज़ था वो
प्यार का

मिल रहा सब से
स्नेह और दुलार

फिर भी मन तरसता  है
उस तकरार को

रिपु दमन

Fighting To fight for something Identify your bars, your enemies Grade and locate your enemies And pick out the source of initiation of enmity. To fight for something Think hundred times about the policy Count your power and that of opponent Fight against main enemy detected well. Lust, anger, greed, attachment Jealousy and arrogance The six enemies age old Showing their evil faces more or less. To cut short our problems To put an end to our problems We look into our eternal foes - We see love comes from lust and beauty from sex Intense urges from anger Hope from greed Attention from attachment Will force from jealousy And exceptionality from arrogance. Last of all considering all factors We come to the point We should take challenge for fight against extra greed Maddening our lives in this wonderful land. We must have to win this fighting.



















                        रिपु दमन

किसी भी उद्देश्य हेतु लड़ने के लिए

चिन्हित कीजिये अपने अवरोध, अपने शत्रु
वर्गीकृत कीजिये और खोजिये अपने शत्रु
और खोजिये इस शत्रुता के आरम्भ होने की वजह

किसी भी युद्ध को शुरू करने से पूर्व
सौ बार सोचिए अपनी नीतियों के बारे में
अपनी शक्ति का आँकलन कीजिये
और आंकिये ताकत अपने शत्रु  की
शुरू कीजिये युद्ध उसके विरुद्ध
जो मुख्य शत्रु चिन्हित किया आपने


वासना, क्रोध, लोभ ,मोह,
ईर्ष्या और घमण्ड
यह छः हमारे बरसों पुराने शत्रु  हैं
बारम्बार अपने बुरे चेहरे
हमें दिखाते हुए


अपनी समस्याएं घटाने के लिए
अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए
अपने पुरातन रिपुओं को जानिए


प्यार उपजता है वासना से
और सौन्दर्य  कामुकता  से
क्रोध जन्मता है गहरे उद्धवेग
आशा उपजती है लोभ से
मोह जगाता है ध्यान आकर्षण
प्रबल इच्छा उपजती है
 ईर्ष्या के वशीभूत होने से
और अनूठे होने का एहसास अहंकार से


अंतंतः इन सब पहलुओं को विचारते हुए
हमें स्वीकारनी ही होगी यह ललकार
लोभ के विरुद्ध लड़ने की
जिसने की पगला रखा है हमें
इस अनूठी धरा पर

हमें जीतना ही होगा यह युद्ध
करना ही होगा रिपुदमन/


RIPU DAMAN

kisee bhee udheshy hetu ladne ke liye

hinhit kijiye, apne avrodh, apne shatru

vrgikrit kijiye aur khojiye apne shatru

aur khojiye is shatruta ke araambh hone kee wajah


 kisee bhee yudh ko shuru krne se purv

so baar sochiiye apnee neetiyon ke bare main

apnee shakti ka aankln kijiye

aau aankiye taakat apne shatru kee

shuru kijiye yuudh us ke virudh

jo mukhy shatru chinhit kiya aapne



Vasana, krodh, lobh, moh

iirshya aur ghamand

yeh chah hamare berson purane shatru hain

barambar apne bure chehre hamen dikhate  hue


apnee samasyayen ghatane ke liye

apnee samsyayaon se mukti paane ke liye

apne puratan ripuon ko janiye


pyar upajata hai wasana se

aur soundraya kamukta se

krodh janmata hai gahre udhveg se

asha upjatee hai lobh se

moh jagata hai dhyaan aakarshan

prabal ichha upjtee hai

irshya ke vashibhut hone se

aur anoothe hone ka ehsaas , ahankaar se


antatah in sb pahluon ko vicharte hue

hamen swekarnee hee hogee chunotee

lobh ke virudh ladne kee

jisne kee paglaa rakha hain hamen

is anuthee dhara pr.



hamen jeetna hee hoga yeh yudh

krna hee hoga ripudaman

मानुष

  •  बंगाली के ख्यातिनाम कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम की सुप्रिसद्ध बंगाली कविता 'मानुष' का मेरे द्धारा किया गया हिंदी में अनुवाद/उन्होंने देशभक्ति पर आधारित १००० से अधिक गीत लिखे और विद्रोही कवि  के रूप में प्रसिद्ध हैं/मेरा यह अनुवाद कार्य बंगलादेश के प्रसिद्ध कवि श्यामल कुमार द्धारा मानुष कविता के इंग्लिश अनुवाद पर आधारित है/
  • मानुष 
आओ, हम समानता के गीत गुनगुनाएँ 
क्योंकि मनुष्य अन्य सभी प्राणियों से
अधिक श्रेष्ठ और अतुलनीय है 
यहाँ तक कि गुण स्वभाव में 
नहीं रखता कोई भेदभाव. 

हे आराधना करने वाले, द्धार खोलो 

पूजा का समय हो रहा है/
देववाणी का सपना देखता है पुजारी 
और जाग उठता है बेहिचक 
एक राजा या उसके जैसे ही उत्साह के साथ 

परन्तु यह आवाज तो थी 

एक चीथड़ों में लिपटे, दुबले पतले राही की 
"मुझे कुछ प्रसाद दो,
मैं भूखा हूँ सात दिन से/ "

अनायास ही द्धार बंद कर दिया गया 

उसकी आँखों के सामने ही 
चल दिया राही वहाँ से 
परन्तु भूख के माणक 
ज्वलंत होने लगे/
उस अँधियारी रात में 

उसने आह भर कर कहा 
" इस मंदिर का शासक तो वह पुजारी है 
प्रभु, तुम नहीं"

कल एक मस्ज़िद में 

एक पारंपरिक दावत थी 
एक बड़ी तादाद में गोश्त और रोटी को 
किसी ने छुआ तक नहीं था/
जिसे देख कर मुल्ला के चेहरे पर
मुस्कान खिल उठी थी /


उसी समय एक राहगीर , जिसके चेहरे पर 
एक अरसे की भुखमरी झलक रही थी 
उसके क़रीब आ कर बोला 
"अब्बा जान, आज सहित एक हफ्ते से भूखा हूँ 
मुझे कुछ खाना खाने की इजाजत दीजिये"


इस पर वह मुल्ला बहुत बेरुखी से उसके पास पहुंचा 
और बोला,"क्या बेकार की बातें करते हो 
अरे ! बदमाश, अगर तुम भूखे हो 
यहाँ से कहीं दूर चले जाओ 
राहगीर , क्या तुमने कभी अल्लाह की इबादत की है?"
"नहीं , अब्बा जान," उसने जवाब दिया /
दफा हो जाओ"  मुल्ला चिल्लाया /
सारा गोश्त और रोटी उठाते हुए,
मुल्ला से मस्जिद को ताला लगाया/


राहगीर चलता गया बुदबुदाते हुए
इस से पहले मैं  कभी एक दिन के लिए भी 
भूखा नहीं रहा था/
लगातार अस्सी साल तक 
ख़ुदा की इबादत न करने के बावजूद भी /
पर आज ही ऐसा हुआ /
हे! प्रभु साधारण आदमी को कोई अधिकार नहीं 
तुम्हारी मस्ज़िद या मन्दिर में आने का/
मुल्ला और पुजारियों ने बंद कर दिए हैं सब दरवाज़े /


कहाँ हैं चंगेज़, ग़ज़नी का महमूद और कल्पाहार 
सभी मन्दिरो, मस्जिदों के बन्द दरवाज़ों के ताले खोलो 
किसकी हिम्मत है कि दरवाज़े बंद करे
और मुख्य द्धार पर ताले लगा दे 
इस सब के द्धार खुले ही रहने चाहिए 
हथौड़े और छैनी उठाओ और शुरू करो अभियान/


उफ़ ! मंदिरो के शिखर पर चढे नकली लोग 
स्वार्थ की विजय के गीत गाते हैं 
मानव मात्र से घृणा करते हुए 
लगातार चूमते रहते हैं
 क़ुरान, वेद और बाइबल
तुम बलपूर्वक वापिस ले लो उनसे 
उन पुराणों और धार्मिक किताबों  से 
दूर कर दो उनके लब /


उन लोगो को यातनाएं दे रहे हैं वो, 
जो पुराणों से दूर हो गए 
और यह बनावटी लोग
ग्रन्थों की पूजा कर रहें हैं/
मेरी बात पर ध्यान दो 
पुराण मनुष्यों द्धारा रचे गए 
किसी पुराण से मनुष्य नहीं रचे/


आदम, दाऊद, ईशा, मूसा , अब्राहम, मुहम्मद 
कृष्णा,बुद्धा , नानक और क़बीर 
सब इस दुनिया की विभूतियाँ हैं/
हम उनकी संतान हैं और उनके रिश्तेदार हैं,
हमारी धमनियों और शिराओं में उनका रक्त बहता है/
यही नहीं, हमारी शारिरिक सरंचना भी उन जैसी है 


कोई नहीं जानता, वक़्त के किसी मोड़ पर 
हम भी बदल कर उन जैसे हो जाएँ /
प्रिय मित्रों, मेरी हँसी न उडाओं,
मेरा अस्तित्व कितना गहरा और अथाह है 
न तो मुझे मालूम है ,न किसी और को 
 कौन सा महान प्राणी, मुझ में ही बसता है/


हो सकता है कालकी मुझ में अवतरित हो रही हो 
और मेहदी ईशा तुम में 
किसी को किसी के बारे में सम्पूर्ण जानकारी कहाँ /
किसी के पद, किस की पहुँच हो जाए/
तुम किसी भी भाई से नफरत कर रहे हो 
या किसी को ठोकरें मार रहे हो 
हो सकता है उस के मन में 
भगवान् जागृत हो रहें हों/ 
या यह भी हो सकता है कि 
वह कुछ भी नहीं हो,
संभव हैं वह दीन हीन जीवन जी रहा हो,
आहत और दुःखों से टूटा हुआ/
परन्तु यह शरीर मात्र ही इतना पवित्र हैं कि 
यह संसार के सब ग्रन्थों और पुराणों से ऊपर है/

हो सकता है वह अपने शुक्राणुओं से,अपने घर में 
उत्पन्न कर  रहा हो, एक ऐसा विलक्षण जीव 
जो दुर्लभ हो इतिहास में 
एक ऐसा उपदेश जो कभी किसी ने सुना न हो 
एक ऐसी महाशक्ति जो पहले कभी किसी ने देखी न हो 
संभवतः यही और वह इस झोपड़ें के अस्तित्व में हो/

कौन है वो ? चाण्डाल ?
तुम इस से इतना बचना क्यों चाह रहे हो?
कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे  देख तुम्हारा जी मितलाने लगे/
हो सकता है वो हरीशचंद्र हो या शिव, उस दाहगृह में /
आज वो चांडाल है,  हो सकता है 
कल एक महान योगी में बदल जाए /
तब तुम उसकी पूजा करोगे/

तुम किसकी अवहेलना कर रहे हो/
कौन किसको गतिमान करता है/
हो सकता है, चुपके चुपके , चोरी चोरी 
गोपाल आ गए हों चरवाहे के भेष में
या फिर बलराम ही आ गए हों किसान का रूप धर ,
या फिर पैगम्बर आ गए हो चरवाहे के रूप में/

यह सभी हमारे संचालन  कर्ता हो सकते हैं 
उन्होंने ही तो दिए हैं हमें शाश्वत  सन्देश/
जो लगातार हैं और हमेशा रहेंगे /

हो सकता है तुम्हारे आनंद का भाग काट दिया जाये 
तुम्हे भगवान से  दूर खदेड़ दिया जाये , दरबान के द्धारा /
उस अपमान का हिसाब किताब अभी बाकी है 
कौन जाने अपमानित भगवान ने तुम्हें माफ़ किया या नहीं /

मित्र! तुम लालची हो गए हो और तुम्हारी आंखो पर लोभ के पर्दे पड़े हैं/
अन्यथा तुम में स्वयं देखने की सामर्थ्य है/
तुम्हारी सेवा के लिए भगवन  खुद भारवाहक बन गया है 
चाहे कितना भी सीमित हो , दैवीय यातनाओं का  अमृत 
मनुष्य के पास 
क्या तुम इसे लूट लोगे 
अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ?
मंदोदरी जानती है, तुम्हारी वासना के बारे में 
जानती है कहाँ छुपा रखा है तुमने
घातक तीर अपने महल में 

हर युग में 
इच्छाओं की मलिका ने 
धकेल दिया है तुम सरीखे क्रूर को 
मौत की खाई में /


रजनी छाबड़ा 

Wednesday, October 12, 2016

सिर्फ़ अपना


सिर्फ़ अपना

खुशियों पर अमूनन
ज़माने का पहरा होता है/

गम सिर्फ अपना होता है
जब बहुत गहरा होता है/


ਸਿਰਫ ਆਪਣਾ 

ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਤੇ ਅਕਸਰ 
ਜ਼ਮਾਨੇ ਦਾ ਪਹਿਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੇ 

ਗਮ ਸਿਰਫ ਆਪਣਾ ਹੁੰਦਾ ਹੇ 
ਜਦੋਂ ਬੋਹੜ ਗਹਿਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੇ 



Tuesday, October 11, 2016

क़िरदार

वक़्त के लंबे सफर में
क़िरदार यूं बदल जाते हैं
वो जो कल चला करते थे
थामे अंगुली हमारी
वही आज हमें
राह दिखाते हैं/

Saturday, August 13, 2016

अविश्वसनीय परन्तु अत्यन्त दुखद समाचार की हम सबके अतिप्रिय राजस्थानी व् हिंदी भाषा के सुप्रसिद्ध कवि व आलोचक ओम पुरोहित जी कागद जी का आज सड़क दुर्घटना में आकस्मिक , असामयिक निधन हो गया/ परमात्मा उनकी आत्मा को  शांति दे व् उनके परिवार को एवम  समस्त साहित्य जगत को यह सदमा सहने की शक्ति दे/
ओम जी गत 2  वर्षों से मेरे फेसबुक मित्र थे और मई में मेरे बीकानेर प्रवास के दौरान मुझे उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था/ मेरे निवास स्थान पर पधारे थे/ सरल स्वभाव और सादगी पूर्ण व्यक्तित्व/ उनकी मिलनसारिता से बहुत प्रभावित हुए , मैं और मेरे परिवार के सदस्य/ मेरे दोनों हिदी काव्य संग्रह की समीक्षा भी उन्होंने लिखी थी और मैंने  भी इन दिनों उनकी कुछ चुनिंदा हिंदी व् राजस्थानी कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था /  आत्मीय लगाव था  उनसे/ उनकी कमी हमेशा महसूस होगी/

आप सब के साथ उनका जीवनवृतांत व् साहित्यिक उपलब्धियाँ सांझा कर रही हूँ;ओम जी ने कुछ समय पहले  यह सब जानकारी मुझे मेल भेजकर उपलब्ध करवाई क्योँकि में उनकी रचनाओं के अनुवाद कार्य के प्रोजेक्ट में उनकी साथ थी/ अपने उत्कृष्ट लेखन के माध्यम से ओम जी हमेशा हमारे साथ रहेंगे/

ओम पुरोहित "कागद"
जलम- 05 जुलाई 1957, केसरीसिंहपुर (श्रीगंगानगर)
भणाई- एम.ए. (इतिहास), बी.एड. एवम राजस्थानी विशारद
छप्योडी पोथ्यां - [ हिन्दी ] :- धूप क्यों छेड़ती है (कविता संग्रह), थिरकती है तृष्णा (कविता संग्रह) आदमी नहीं है(कवितासंग्रह), कागज पर सूरज (कवितासंग्रह) मीठे बोलों की शब्दपरी (बाल कविता संग्रह), मरूधरा (सम्पादित विविधा), जंगल मत काटो (बाल नाटक), रंगो की दुनिया (बाल विविधा), सीतानहीं मानी (बाल कहानी),राधा की नानी (बाल कहानी), ज़ंगीरो की जंग ( साक्षरता कहानी)
छप्योडी पोथ्यां - [ राजस्थानी ] :-  अन्तस री बळत (कविता संग्रै), कुचरणी, (कविता संग्रै),सबद गळगळा (कविता संग्रै) , बात तो ही(कविता संग्रै), कुचरण्यां (कविता संग्रै), पचलड़ी (कविता संग्रै), आंख भर चितराम (कविता संग्रै) , भोत अंधारो है (कविता संग्रै)  मायड़ भाषा राजस्थानी [ भाषा विमर्ष ] ।
सम्पादन : राजस्थानी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर री मासिक पत्रिका "जागती जोत  " रो दो वर्ष ताईं सम्पादन , अणछपिया राजस्थानी कवियां री कवितावां रा सात संकलन "थार सपतक" रो सम्पादन , विविध रचना संकलन "मरुधरा" रो सम्पादन , विद्यालयी खेल स्मारिका " भटनेरिका , संगम , ज्वाला संदेश रो सम्पादन , जिला साक्षरता समिति रै समाचार पत्र "आखर भटनेर" रो सम्पादन 
पाठ्यक्रम : माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान री हायर सैकण्डरी री राजस्थानी पाठ्य पुस्तक में रचना संकलित  , साक्षरता पुस्तक "आखर मेडी़-1-2-3" रो अर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा री तीसरी अर पांचवीं कक्षावां री पाठ्य पुस्तकां रो लेखन "
प्रसारण : दूरदर्शन एवम आकाशवाणी सूं रचनावां रो लगोलग प्रसारण
पुरस्कार अर सनमान- राजस्थान साहित्य अकादमी रो ‘आदमी नहीं है’ कविता संग्रह माथै काव्य विधा रो सर्वोच्च पुरस्कार ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’, राजस्थानी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर रो कविता संग्रह ‘बात तो ही’ पर काव्य विधा का सर्वोच्च पुरस्कार । महाकवि कन्हैयालाल सेटिया मायड़ भाषा सम्मान, भारतीय कला साहित्य परिषद, भादरा खानीं सूं कवि गोपी कृष्ण ‘दादा’ राजस्थानी पुरस्कार, स्रुजन संस्थान , श्रीगंगानगर , जिला प्रशासन, हनुमानगढ़ सूं कई बार सम्मानित, सरस्वती साहित्यिक संस्था (परलीका) सूं सम्मानित ।
जुडाव : 1- राजस्थान साहित्य अकदमी , उदयपुर री सरस्वती सभा रा सदस्य रह्या । 2-राजस्थान भाषा, साहित्य एवम संस्कृति अकदमी , बीकानेर री उपसमिति में  सदस्य रह्या ।
सम्प्रति-  शैक्षिक प्रकोष्ठ अधिकारी , कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी [मा] , हनुमानगढ ।
            शिक्षा विभाग, राजस्थान 

 ब्लोग - www.omkagad.blogspot.com

















रजनी छाबड़ा

Sunday, July 17, 2016

सिमटते पँख

सिमटते पँख

पर्वत, सागर, अट्टालिकाएं
अनदेखी कर सब बाधाएं
उन्मुक्त उड़ने की चाह को
आ गया है
खुद बखुद ठहराव

रुकना ही न जो जानते थे कभी
बँधे बँधे से चलते हैं वहीँ पाँव

उम्र का आ गया है ऐसा पड़ाव
सपनों को लगने लगा है विराम
सिमटने लगे हैं पँख
नहीं लुभाते अब नए आयाम


बँधी बँधी रफ़्तार से
बेमज़ा है ज़िंदगी का सफ
अनकहे शब्दों को
क्यों न आस की कहानी दें
देरुके रुके क़दमों को
फिर कोई रवानी दें दे/


रजनी छाबड़ा
प्रातः ८.५५
१८/७/२०१६

Tuesday, June 28, 2016

http://www.globalrecorder.com/books-hidden/480-2016-06-28-05-41-59.html

Thursday, June 16, 2016

जानी मानी अंकशास्त्री रजनी छाबड़ा की नई पुस्तक पिघलते हिमखण्ड कूरियर से  मिली है।
यह उनका नया काव्य संग्रह है। इससे पहले नई दिल्ली में वर्ल्ड बुक फेयर में भी एक काव्य संग्रह का विमोचन हुआ था और उस आयोजन का साक्षी बनने का सौभाग्य मिला था।

रजनी जी को नई पुस्तक की सफलता की शुभकामनाएं

Selfy with पिघलते हिमखण्ड

 विनोद गौड़ 
संपादक  दैनिक भास्कर ,कुचामन सिटी , राजस्थान 

Wednesday, April 20, 2016

मेरे तृतीय  काव्य संग्रह 'पिघलते हिमखंड' को लोकार्पण आज हमारे बेंगलोर स्थित निवास स्थान पर सम्पन्न हुआ /इसे मेरा सौभाग्य मानती हूँ की तीनो काव्य संग्रह दिल्ली के प्रतिष्ठित प्रकाशन 'अयन प्रकाशन ' द्वारा क्रमश अक्टूबर २०१५,, जनवरी २०१६ और आज २० अप्रैल को प्रकाशित और लोकार्पित हुए और इन सभी की प्रथम प्रति मुझे 

श्री भूपाल सूद ( प्रकाशक महोदय) व् श्रीमती चन्द्र  प्रभा सूद के कर कमलों से प्राप्त हुई /

Monday, March 28, 2016

पिघलते हिमखंड"

पिघलते हिमखंड"

तार-तार होते सामाजिक ताने-बाने को फ़िर से बुनने का प्रयास :"पिघलते हिमखंड" 

मेरा आगामी हिंदी काव्य संग्रह "पिघलते हिमखंड" प्रकाशनाधीन,( अयन प्रकाशन, दिल्ली , लगातार तीसरी बार मेरे काव्य संग्रहों के प्रकाशक) बस थोड़ा समय और प्रतीक्षा कीजिये मेरे साथ ही/  

Tuesday, March 15, 2016

Hi, Frds, feeling motivated by wide response from poetry lovers, I have planned to get one more Hindi Kavay Sangrah published from same publisher AYAN PRKASHAN. Title will be PIGHALTE HIMKHAND. Hope, u will support me this time too. Your well wishes and comments mean a lot to me.

Monday, March 7, 2016

आज की नारी

आज की नारी 
आज की नारी 
अबला नहीं 
जो विषम परिस्थितियों मैं 
टूटी माला के मोतियों सी 
बिखर जाती है 

आज की नारी सबला है,
जिसे टूट कर भी 
जुड़ने और जोड़ने  की
कला आती है

Monday, February 1, 2016

यह कैसा सिलसिला



  • यह कैसा सिलसिला

  • कभी कभी दो कतरे नेह के 
  • दे जाते हैं सागर सा एहसास 

  • कभी कभी  सागर भी 
  • प्यास बुझा नहीं पाता 


       जाने प्यास का यह कैसा है 

       सिलसिला और नाता 


       रजनी छाबड़ा 

स्त्री मन को शब्द देती कविताएं : होने से न होने तक

अयन प्रकाशन, दिल्ली द्वारा मेरे सद्य प्रकाशित प्रथम हिंदी काव्य संग्रह 'होने से न होने'तक की गहन समीक्षा के लिए प्रतिष्ठित कवि व् आलोचक ओम पुरोहित कागद जी का आभार
स्त्री मन को शब्द देती कविताएं : होने से न होने तक
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■ओम पुरोहित कागद
विराट से प्राप्त अनुभवों को अपने परिवेश के साथ गूंथता हुआ एक कवि उन्हें कविता का रूप देता है जिस में वह समष्टि को अपने "मैं" के माध्यम तक से कहने में भी पीछे नहीं हटता । इस उपक्रम में वह होने से न होने तक को प्रकट करने की कौशिस करता है । इस पर भी विश्वास और गहरा होने लगता है जब एक कवयित्री अपने अनुभव संसार को शब्द देती है । कवि अपने स्व और अपनी निजता को शब्द देने में लाचार होता दिखता है तो वहीं स्त्रियां अतिसूक्ष्म संवेदनाओं को उकेरने में ईमानदार नजर आती हैं । लेखनी जब पुरुष के हाथ में होती है तो स्त्री-पुरुष के बीच के भेदभावों से सम्बद्ध बहुत से पहलू बहुधा छूट जाते हैं मगर उन्हीं पहलुओं पर कवयित्रियाँ बेबाकी से लिख जाती हैं । स्त्री के सुख-दुःख और सपने पुरुष से इतर होते हैं तो उनके लिए उपक्रम व परिणाम भी भिन्न होते हैं । पुरुष की मुखरता स्त्री के सम्पूर्ण सम्वेदन को व्यक्त करने में सक्षम नहीं कही जा सकती ।
उपर्युक्त विचार हिंदी एवम् अंग्रेजी की कवयित्री रजनी छाबड़ा की सद्य प्रकाशित काव्यकृति "होने से न होने तक " को पढ़ने के बाद स्पष्ट रूप से सामने आता है । इस कविता संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि स्त्रियां अपनी निजता में एक विशेष प्रकार की घुटन में जीती हैं । एक स्त्री के जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे वह सामाजिक एवम् पारिवारिक अदृश्य दबाव के चलते चाह कर भी व्यक्त नहीं कर पाती । इस बात को रजनी छाबड़ा अपनी कविता "हम जिंदगी से क्या चाहते हैं " की इन पंक्तियों में दबी जुबान में यूं कह जाती हैं -
उभरती है जब मन में
लीक से हट कर ,
कुछ कर गुजरने की चाह
संस्कारों की लोरी दे कर
उस चाहत को सुलाए जाते हैं । ( पृष्ठ 13)
*
कुछ कर गुजरने की चाहत
कुछ न कर पाने की कसक
अजीब कशमश में
जिंदगी जिए जाते हैं । (पृष्ठ 14)
कवयित्री रजनी छाबड़ा स्त्री मन के सूनेपन को शब्द देती हैं तो उसे जीवन को अपने तरीके से जीने का सन्देश भी देती हैं । यहां कवयित्री की व्याकुलता , विवशता , अनुभूतियों के चित्रण व छटपटाहट निजी न हो कर सम्पूर्ण वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं । इस व्यथा को शब्द देते हुए रजनी छाबड़ा कहती हैं-
जुबां मैं भी रखती हूं
मगर खामोश हूं
क्या दूं
दुनिया के
सवालों के जवाब
जिंदगी जब खुद
एक सवाल
बन कर रह गई । ( पृष्ठ 75 )
*
रह रह कर मन में
इक कसक सी उभर आए
काश !इक मुट्ठी आसमान
मेरा भी होता । (पृष्ठ 81)
रजनी छाबड़ा की कविताओं में संवेदनाएं व्यापक हैं मगर उन संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए उनके पास अपना मुहावरा और अपनी भाषा है । बहुत बड़ी बात को वे बहुत सरल तरीके से कह जाती हैं । उनका अनुभव संसार इतना विराट है कि किसी विशिष्ट भाषा की दरकार ही अनुभव नहीं होती । रजनी छाबड़ा की इन सहज सरल कविताओं का साहित्य जगत में स्वागत होगा ।

पुस्तक : होने से न होने तक
लेखिका : रजनी छाबड़ा
विधा : कविता
मूल्य : 200 रुपये
संस्करण : 2016
प्रकाशक : अयन प्रकाशन
1/20 ,महरोली , नई दिल्ली-110030

Friday, January 29, 2016

खामोश लब

खामोश लबों की
अपनी ज़ुबान होती है
हर एक दास्तान
आँखों से बयान होती है

समझ सकते हैं इसे
तन्हा मोहब्बत भरे दिल
महफ़िल ए दुनिया
इस से अनजान होती है

रजनी छाबड़ा 

Sunday, January 10, 2016

खिलौनों सरीखे

या! खुदा 
हर घर मैं 
खिलौनों सरीखे 
बच्चे दे 
और बच्चों को खिलोने दे 

सुख की नींद 
 और बिछौने दे 
ममता की छाँव 
और सपने सलोने दे 


किलकिलाते रहें 
खिलखिलाते रहे
आँखों मैं आसूँ 
न कभी होने दे  

 रजनी छाबड़ा