Saturday, May 9, 2015

क्या तुम सुन रही हो,माँ

क्या तुम सुन रही हो,माँ
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माँ,तुम अक्सर कहा करती थी
बबली,इतनी खामोश क्यों हो
कुछ तो बोला करो
मन के दरवाज़े पर दस्तक दो
शब्दों की आहट से खोला करो


अब मुखर हुई हूँ,
तुम ही नहीं सुनने के लिए
विचारों का जो कारवां
तुम मेरे ज़हन में छोड़ गयी
वादा है तुमसे
यूं ही बढ़ते  रहने दूंगी


सारी कायनात में तुम्हारी झलक देख
सरल शब्दों की अभिव्यक्ति को
निर्मल सरिता सा
यूं ही बहने दूंगी


मेरा मौन अब
स्वरित हो गया है/
माँ,क्या तुम सुन रही हो

रजनी छाबड़ा