Friday, January 2, 2026

आमन्त्रण






आमन्त्रण


 

इतना इतराया मत करो

 इतना इतराया  मत करो 

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तुम्हारी भव्यता की क़ायल हूँ मैं  
मुझे यह स्वीकारने में
 कोई हिचक नहीं 
अनगिनत तारों जैसी 
 तुम्हारी लहरें गिनना 
 मुमकिन नहीं 
और उस से भी दुश्वार है 
तुम्हारी गहराई की थाह पाना 

पर, सागर तुम इतना इतराया मत करो 
तुम रेत को अपने आवेश में 
बहा ले जा सकते हो 
चट्टान से लड़ने का हौसला 
क्या हैं  तुम में ?

सूर्य की तपन तुम्हे भी 
झेलनी पड़ती है 
पूरे चाँद की रात 
तुम्हें भी मदहोश करती है 
तुम केवल अपनी धुन के 
राजा नहीं हो सकते/

रजनी छाबड़ा