Friday, September 18, 2009

BAAT SIRF ITNEE SEE

बात सिर्फ इतनी सी 
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बगिया की
शुष्क घास पर
तनहा बैठी वह
और सामने
आँखों मैं तैरते
फूलों से नाज़ुक
किल्कारते बच्चे

बगिया का वीरान कोना
अजनबी का
वहाँ से गुजरना
आंखों का चार होना

संस्कारों की जकड़न 
पहराबंद
उनमुक्त धड़कन
अचकचाए
शब्द
झुकी पलकें
जुबान खामोश
रह गया कुछ
अनसुना,अनकहा

लम्हा वो बीत गया
जीवन यूँ ही रीत गया

जान के भी
अनजान बन
कुछ
बिछुडे ऐसा
न मिल पाये
कभी फिर
जंगल की
दो शाखों सा

आहत मन की बात
सिर्फ इतनी
तुमने पहले क्यों
न कहा

वह  आदिकाल
से अकेली
वो अनंत काल
से उदास
और सामने
फूलों से नाज़ुक बच्चे
खेलते रहे


















वसीयत

सहेज कर रखूँगी
मोतियों की तरह
जो आसूँओं की वसीयत
तुम मेरे नाम कर गए
मुस्कुरा कर सहूँगी
वक्त का हर वो सितम
जो न चाह कर भी
तुम मेरे नाम
कर गए

रोशन रखूंगी
ज़िंदगी की
अंधेरी रातों को
तेरे यादों के
चिराग से
यही यादों की
वसीयत,तुम मेरे
नाम कर गए

फिजायें मेरे देर से
अजनबी सी
गुजर जाती हैं
लाख बदलें
ज़माने के मौसम
अब तो बस
यही खिजा
का मौसम
तुम मेरे नाम कर गए


पथिक बादल

एक पथिक बादल
जो ठहरा था
पल भेर को
मेरे आँगन
अपने स्नेह की
शीतल छाया ले कर
वक्त की बेरहम
आंधियां
जाने
ज़िंदगी के
किस मोड़ पे
छोड़ आयी
रह रह कर मन में
एक कसक
सी उभेरआए
काश! एक
मुठी आसमान
मेरा भी होता
कैद कर लेती उस में
पथिक बादल को
मेरे धुप
से
सुलगते आँगन में
संदली हवाओं का
बसेरा होता






















हसरत

यह हसरत ही रही
ज़िन्दगी की राहों मैं
साथ तेरा होता
पार कर जाते
हँसते हुए
सहरा दर सहरा
गर हाथों मैं
हाथ तेरा होता

मिली रहती गर
तेरे चश्म-ऐ करम
की छाओं
मेरे धुप से सुलगते
आँगन मैं
खुशनुमा हवाओं का
बसेरा होता

मुझे मिली हैं नसीब मैं
जो स्याह दर स्याह रातें
गर तुम साथ होते
स्याह रातों के बाद
उजला सवेरा होता

ज़िंदगी है मेरी
तेरी अधूरी किताब
होता गेर
तेरे मेरे बस मैं
मुकमल यह अफसाना
मेरा होता

















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सुकून

सुकून मैं कहाँ
वो मज़ा
जो दे बेताबी
जूनून देता बेताबी
हर पल पाने को
कामयाबी
सुकून है मंजिल
रास्ता बेताबी

रजनी छाबड़ा