Friday, September 18, 2009

BAAT SIRF ITNEE SEE

बात सिर्फ इतनी सी 
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बगिया की
शुष्क घास पर
तनहा बैठी वह
और सामने
आँखों मैं तैरते
फूलों से नाज़ुक
किल्कारते बच्चे

बगिया का वीरान कोना
अजनबी का
वहाँ से गुजरना
आंखों का चार होना

संस्कारों की जकड़न 
पहराबंद
उनमुक्त धड़कन
अचकचाए
शब्द
झुकी पलकें
जुबान खामोश
रह गया कुछ
अनसुना,अनकहा

लम्हा वो बीत गया
जीवन यूँ ही रीत गया

जान के भी
अनजान बन
कुछ
बिछुडे ऐसा
न मिल पाये
कभी फिर
जंगल की
दो शाखों सा

आहत मन की बात
सिर्फ इतनी
तुमने पहले क्यों
न कहा

वह  आदिकाल
से अकेली
वो अनंत काल
से उदास
और सामने
फूलों से नाज़ुक बच्चे
खेलते रहे


















3 comments:

  1. Tumne us Akeli ke man ki Vedna ko Chitrath kiya hai .......... mano ek paripurn chitra aankho ke saamne utaar diya hai ....
    "अचकचाए
    शब्द
    झुकी पलकें
    जुबान खामोश"
    Mun ke Megh umad ghumad kar barsaa diye tumne yahaa

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  2. akelepan ke dard ko jis gahrai se apne mahsus aur abhivyakt kia vah abhibhut karne wala hai...sach me is dard ko akela sahn karne wala hi jan ta hai......bahut pyari rachna hai....amarjeet

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  3. आहत मन की बात
    सिर्फ इतनी
    तुमने पहले क्यों
    न कहा

    वेह आदिकाल
    से अकेली
    वो ananant काल
    से उदास
    और सामने
    फूलों से नाज़ुक बच्चे
    खेलते रहे

    dil ke har kone har dhadkan ko choo lene waale shabd hain bahut khoob kaha hai

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