Saturday, June 8, 2013

गुलज़ार

गुलज़ार
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सूखे चरमराये फूल पत्ते
जो रौंदे जा रहे हैं
सब के पाँव तले

रौनक थी इनसे भी कभी
गुलज़ार की,
सुकून मिलता था किसी को
इनके साए तले


रजनी छाबड़ा 

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